संपादकीय
क्या बिहार में भ्रष्टाचार की जांच चुनिंदा चेहरों तक सीमित है?
बिहार की राजनीति में भ्रष्टाचार का मुद्दा हमेशा से सबसे संवेदनशील विषय रहा है। लेकिन जब सत्ता परिवर्तन के बाद भी जांच एजेंसियों की कार्यशैली पर सवाल उठने लगें, तब यह केवल प्रशासनिक बहस नहीं रह जाता, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही का प्रश्न बन जाता है।
सांसद सुधाकर सिंह द्वारा जारी ताज़ा प्रेस विज्ञप्ति ने बिहार की प्रशासनिक व्यवस्था, जांच एजेंसियों की निष्पक्षता और विशेष रूप से बिहार विद्यालय परीक्षा समिति (BSEB) के पूर्व संचालन को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। यह आरोप लगाया गया है कि कुछ चर्चित मामलों में छोटे अधिकारियों और कर्मचारियों पर कार्रवाई हुई, लेकिन जिन बड़े अधिकारियों और प्रभावशाली व्यक्तियों के नाम जांच दस्तावेजों, प्रतिवेदन या अन्य एजेंसियों के रिकॉर्ड में सामने आए, उनके विरुद्ध अपेक्षित कठोरता नहीं दिखाई गई।
बक्सर के सांसद ने विशेष निगरानी इकाई (SVU), प्रवर्तन निदेशालय (ED) और बिहार विद्यालय परीक्षा समिति से जुड़े निर्णयों पर प्रश्नचिह्न लगाए गए हैं। आरोप यह भी है कि यदि किसी अधिकारी का नाम विभिन्न जांच प्रक्रियाओं में सामने आया है, तो उसके विरुद्ध समान मानदंडों के तहत कार्रवाई क्यों नहीं हुई। यह सवाल केवल किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का है जिसमें न्याय का पैमाना सबके लिए समान होना चाहिए।
बिहार विद्यालय परीक्षा समिति को लेकर भी कई गंभीर बिंदु उठाए गए हैं। वर्ष 2017 के बाद समिति की कार्यशैली, वित्तीय प्रबंधन, संविदा नियुक्तियां, परीक्षा संचालन, तकनीकी सेवाओं के लिए निजी कंपनियों की नियुक्ति और करोड़ों रुपये के अनुबंधों की प्रक्रिया पर व्यापक ऑडिट की मांग की गई है। यह भी पूछा गया है कि क्या इन व्यवस्थाओं की स्वतंत्र एजेंसियों द्वारा कभी निष्पक्ष समीक्षा कराई गई? यदि नहीं, तो क्यों?
सुधाकर सिंह ने परीक्षा प्रणाली के डिजिटलीकरण, बायोमेट्रिक व्यवस्था और विभिन्न तकनीकी कंपनियों को दिए गए कार्यों का भी उल्लेख किया है। यह मांग की गई है कि इन अनुबंधों की पारदर्शिता, चयन प्रक्रिया और वित्तीय अनुमोदन सार्वजनिक किए जाएं, ताकि जनता के मन में उठ रहे संदेह दूर हो सकें।
हालांकि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि किसी भी व्यक्ति को केवल आरोपों के आधार पर दोषी नहीं माना जा सकता। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जांच एजेंसियों का दायित्व तथ्यों, साक्ष्यों और विधिक प्रक्रिया के आधार पर निष्कर्ष निकालना है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जांच की निष्पक्षता केवल होनी ही नहीं चाहिए, बल्कि दिखनी भी चाहिए।
सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या बिहार में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई वास्तव में समान रूप से लड़ी जा रही है, या फिर कार्रवाई का दायरा केवल सीमित स्तर तक ही सिमट गया है? क्या बड़ी मछलियां अब भी व्यवस्था की सुरक्षा-कवच में हैं, जबकि छोटे कर्मचारी और अधिकारी जवाबदेही का बोझ उठा रहे हैं?
यदि सरकार और जांच एजेंसियां इन सवालों पर पारदर्शी जवाब देती हैं, स्वतंत्र ऑडिट कराती हैं और सभी मामलों में समान मानदंड अपनाती हैं, तो इससे जनता का विश्वास मजबूत होगा। लेकिन यदि सवाल उठते रहेंगे और जवाब नहीं मिलेंगे, तो अविश्वास का दायरा और व्यापक होगा।
लोकतंत्र में सत्ता की सबसे बड़ी ताकत जवाबदेही होती है। बिहार की जनता अब केवल कार्रवाई नहीं, बल्कि निष्पक्षता का प्रमाण भी चाहती है। क्योंकि अंततः प्रश्न किसी व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का है जिस पर करोड़ों लोगों का भरोसा टिका हुआ है।\
ब्रजेन्द्र मिश्र
प्रधान संपादक
चौकस भारत
