राजनीतिक अराजकता के बाद उम्मीद की किरण
1969 की अस्थिर राजनीति और राष्ट्रपति शासन के बाद बिहार 1972 में एक बार फिर जनादेश देने निकला। जनता अब स्थिर सरकार चाहती थी, जो विकास, रोजगार और प्रशासनिक पारदर्शिता सुनिश्चित करे। इस छठे विधानसभा चुनाव में कुल 318 सीटों पर मुकाबला हुआ। इस बार कांग्रेस ने दोबारा अपने संगठन को मज़बूत किया और जनता से “स्थिर सरकार, विकास की राह” का वादा किया।
परिणामस्वरूप, कांग्रेस (INC) ने 167 सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) को 35 सीटें और समाजवादी पार्टी (SP) को 34 सीटें मिलीं। यह परिणाम दिखाता था कि बिहार अब स्थिरता की ओर लौट रहा था, लेकिन समाजवादी विचारधारा अभी भी ग्रामीण इलाकों में गहराई से जमी हुई थी।
कांग्रेस की पुनर्स्थापना: केदार पांडे से लेकर अब्दुल गफूर तक
1972 में कांग्रेस की जीत के साथ केदार पांडे बिहार के मुख्यमंत्री बने। उन्होंने प्रशासनिक सख़्ती और विकास योजनाओं के माध्यम से राज्य में विश्वास बहाल करने की कोशिश की। परंतु राजनीतिक दबावों और गुटबाजी के चलते उन्हें जल्द ही पद छोड़ना पड़ा।
उनके बाद अब्दुल गफूर और फिर जगन्नाथ मिश्रा ने सत्ता संभाली। यह तीन नेतृत्व परिवर्तन कांग्रेस के भीतर उथल-पुथल का संकेत थे, लेकिन बाहरी तौर पर पार्टी ने प्रशासनिक स्थिरता बनाए रखने का प्रयास किया।
इन तीनों नेताओं का कार्यकाल बिहार की राजनीति में एक नया प्रयोग था— नेतृत्व में वैविध्य और समावेशिता की शुरुआत।
जिलों में जनादेश का बिखराव: जीती कांग्रेस, बढ़ा वामपंथ
1972 का जनादेश पूरे बिहार में एक समान नहीं था।
उत्तर बिहार जैसे के जिलों सीतामढ़ी, मधुबनी, समस्तीपुर और दरभंगा में समाजवादी पार्टी और वामपंथी दलों ने उल्लेखनीय प्रदर्शन किया। इन इलाकों में भूमि सुधार, किसान आंदोलनों और श्रमिक संगठनों की सक्रियता से कांग्रेस को कड़ी चुनौती मिली।
दूसरी ओर, पटना, गया, मुंगेर, भागलपुर और पूर्णिया जैसे मध्य और दक्षिणी जिलों में कांग्रेस ने ज़ोरदार वापसी की। भागलपुर जिले में कांग्रेस ने 12 में से 9 सीटें जीतीं, जबकि पटना जिले में उसने 14 में से 10 सीटों पर कब्जा किया।
गया और नालंदा में वामपंथ का प्रभाव दिखा — CPI ने यहाँ कुल 8 सीटें जीतीं।
इस तरह बिहार की राजनीतिक तस्वीर अब पूरी तरह विचारधाराओं के टकराव का केंद्र बन चुकी थी।
विकास योजनाओं की नई शुरुआत
कांग्रेस की वापसी के साथ बिहार ने पंचवर्षीय योजनाओं के तहत विकास की नई शुरुआत की। केदार पांडे और अब्दुल गफूर की सरकारों ने सिंचाई, सड़क, ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों और शिक्षा संस्थानों पर विशेष ध्यान दिया।
पटना विश्वविद्यालय और दरभंगा के शैक्षणिक विस्तार को प्रोत्साहन मिला। औद्योगिक निवेश के लिए नीतियाँ बनाई गईं, और भागलपुर सिल्क उद्योग, हाजीपुर के केला प्रोसेसिंग उद्योग तथा मुंगेर के लघु उद्योगों को नई दिशा मिली।
सरकार ने यह संदेश दिया कि अब बिहार केवल राजनीति नहीं, विकास की प्रयोगशाला बनेगा।
कांग्रेस के भीतर मतभेद और सीमाएँ
हालाँकि कांग्रेस बहुमत में थी, पर अंदरूनी गुटबाज़ी ने उसकी छवि को फिर से नुकसान पहुँचाया।
केदार पांडे बनाम अब्दुल गफूर और बाद में जगन्नाथ मिश्रा बनाम संगठन के वरिष्ठ नेताओं की खींचतान ने पार्टी को भीतर से कमजोर किया।
ग्रामीण इलाकों में योजनाएँ शुरू हुईं, पर भ्रष्टाचार और नौकरशाही की सुस्ती ने उनके असर को सीमित रखा।
वहीं वामपंथी दलों ने कांग्रेस पर “गरीबों और किसानों की अनदेखी” का आरोप लगाकर वैकल्पिक राजनीति को मजबूत किया।
जनता की सोच: विकास चाहिए, बहाने नहीं
1972 के चुनाव ने यह दिखाया कि बिहार की जनता अब केवल नारों से नहीं, नतीजों से प्रभावित होती है।
ग्रामीण मतदाता शिक्षा, सिंचाई और रोजगार को लेकर ज्यादा सजग हो चुके थे।
शहरी इलाकों में युवाओं ने कांग्रेस को मौका दिया, लेकिन साथ ही समाजवादी विचारधारा के लिए जगह भी छोड़ी।
यह वही दौर था जब बिहार की राजनीति ने जातीय समीकरणों से ऊपर उठकर विकास बनाम वैकल्पिक विचारधारा का स्वरूप लेना शुरू किया।
स्थिरता मिली, लेकिन संघर्ष बाकी रहा
1972 का बिहार विधानसभा चुनाव एक संक्रमणकालीन जीत थी जहाँ जनता ने अराजकता के बाद स्थिरता को चुना, लेकिन राजनीतिक संघर्ष जारी रहा।
कांग्रेस सत्ता में लौटी, पर अपने ही भीतर के द्वंद्व से मुक्त नहीं हो सकी।
वामपंथ और समाजवाद ने बिहार की ज़मीन पर गहरी जड़ें जमा लीं, जिनका प्रभाव आने वाले दशकों तक दिखता रहा।
यह चुनाव इस सच्चाई का प्रतीक था कि *बिहार की जनता अब जाग चुकी है — उसे केवल शासन नहीं, जवाबदेही भी चाहिए।
