मंदिर केवल पूजा की जगह नहीं होते, वे समाज के सामूहिक विश्वास के प्रतीक होते हैं। वहां दिया गया हर पैसा दान नहीं, श्रद्धा का प्रमाण होता है। इसलिए जब किसी मंदिर में चढ़ावे की रकम पर गबन, हेराफेरी या चोरी के आरोप लगते हैं, तो यह सिर्फ एक आर्थिक अपराध नहीं रह जाता; यह आस्था की पवित्रता पर सीधा आघात बन जाता है।
देश के अलग-अलग मंदिरों से दान की रकम में अनियमितता की खबरें आना चिंता का विषय है। अयोध्या जैसे अत्यंत संवेदनशील और सार्वजनिक आस्था के केंद्र से लेकर दक्षिण भारत और अन्य धार्मिक स्थलों तक, बार-बार सामने आते ऐसे प्रकरण एक कड़वी सच्चाई बताते हैं—धार्मिक संस्थाओं की वित्तीय व्यवस्था अभी भी उतनी पारदर्शी नहीं है, जितनी होनी चाहिए। जिस व्यवस्था पर करोड़ों श्रद्धालु आंख मूंदकर भरोसा करते हैं, उसी व्यवस्था में अगर गिनती, निगरानी और जवाबदेही कमजोर हो, तो भ्रष्टाचार के लिए जगह खुद-ब-खुद बन जाती है।
यहां सबसे बड़ा प्रश्न अपराधियों का नहीं, व्यवस्था का है। चोर तो हर समाज में होते हैं, लेकिन असली विफलता तब होती है जब संस्थागत सुरक्षा ढीली हो, ऑडिट औपचारिकता बन जाए, सीसीटीवी सिर्फ दिखावे के लिए लगाए जाएं, और दान की रसीद से लेकर जमा रकम तक की हर परत पर स्वतंत्र निगरानी न हो। मंदिरों के प्रबंधन में अक्सर अपार श्रद्धा, लेकिन कम पारदर्शिता दिखाई देती है। यही वह अंतर है, जहां अनैतिक लोग घुसपैठ कर जाते हैं।
यह समय केवल दोषियों की गिरफ्तारी का नहीं, बल्कि मंदिर प्रबंधन की पूरी प्रणाली को नए सिरे से देखने का है। दान-पात्रों की गिनती सार्वजनिक और रिकॉर्डेड होनी चाहिए। हर बड़े मंदिर में डिजिटल ट्रैकिंग, नियमित थर्ड-पार्टी ऑडिट और स्वतंत्र वित्तीय निरीक्षण अनिवार्य होना चाहिए। ट्रस्टों और प्रबंधन समितियों को यह मानना होगा कि श्रद्धा का सम्मान तभी बचेगा, जब हिसाब में भी ईमानदारी होगी। आस्था के नाम पर अपारदर्शिता को ढकने की कोशिशें अब नहीं चल सकतीं।

सवाल यह भी है कि धर्मस्थलों की आर्थिक गतिविधियों पर निगरानी किस स्तर की हो? जब आम नागरिक के बैंक खाते, टैक्स रिटर्न और वित्तीय लेन-देन पर इतनी कड़ी निगरानी हो सकती है, तो करोड़ों रुपये के दान-प्रवाह वाले धार्मिक संस्थान क्यों अपवाद बने रहें? धार्मिक स्वतंत्रता का अर्थ वित्तीय छूट नहीं हो सकता। आस्था को संरक्षण चाहिए, लेकिन जवाबदेही से ऊपर नहीं।
मंदिरों में गबन का हर मामला उन लाखों श्रद्धालुओं के साथ विश्वासघात है, जो अपनी मेहनत की कमाई अर्पित करते हैं। सरकारों, ट्रस्टों और मंदिर समितियों को अब यह समझना होगा कि श्रद्धा की रक्षा केवल घंटियों, आरतियों और भव्य निर्माण से नहीं होगी; उसकी रक्षा ईमानदार लेखा, पारदर्शी प्रशासन और कठोर निगरानी से होगी। जब तक दान की हर रुपये की कहानी साफ नहीं होगी, तब तक आस्था पर बार-बार संदेह की छाया पड़ती रहेगी।
यह भी याद रखना चाहिए कि धार्मिक संस्थाएं समाज का नैतिक आधार मानी जाती हैं। अगर वहीं से अनियमितता की खबरें आएंगी, तो यह केवल एक संस्था की नहीं, पूरे सामाजिक चरित्र की क्षति है। इसलिए अब वक्त है कि मंदिरों को सिर्फ पूजा की जगह नहीं, बल्कि पारदर्शिता के आदर्श मॉडल के रूप में भी स्थापित किया जाए। तभी श्रद्धा बची रहेगी, और तभी धर्म सच अर्थों में विश्वास का केंद्र बना रहेगा।
ब्रजेन्द्र मिश्र
प्रधान संपादक
