एशिया का सबसे बड़ा जनजातीय महोत्सव (Tribal Festival), मेदाराम जतारा (Medharam Jathara) तेलंगाना में पारंपरिक उत्साह के साथ शुरू हो गया है। यह दो साल में एक बार ‘माघ’ (फरवरी) के महीने में पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। इस त्योहार का उद्देश्य जनजातीय संस्कृतियों, त्योहारों और विरासत के बारे में जागरूकता पैदा करना और साथ ही आगंतुकों और तेलंगाना के जनजातीय समुदायों के बीच एक सामंजस्यपूर्ण बंधन बनाए रखना है।
जनजातीय मामलों का मंत्रालय (Ministry of Tribal Affairs) इस त्योहार की इवेंट्स को सक्रिय रूप से समर्थन और कवर कर रहा है और तेलंगाना की अनुसूचित जनजातियों के विभिन्न पेचीदा पहलुओं के संरक्षण और प्रचार को सुनिश्चित कर रहा है। 30 लाख से अधिक भक्त सरलम्मा जाते हैं और मेदाराम जतारा के एक भाग के रूप में विशेष पूजा करते हैं।
तेलंगाना के दूसरे सबसे बड़े जनजातीय समुदाय- कोया जनजाति द्वारा चार दिनों तक मनाए जाने वाले कुंभ मेले के बाद मेदाराम जतारा भारत का दूसरा सबसे बड़ा मेला है। एशिया में सबसे बड़े आदिवासी मेले के रूप में, मेदाराम जतारा देवी सम्मक्का (Sammakka) और सरलम्मा (Saralamma) के सम्मान में आयोजित किया जाता है। सरलम्मा, सम्मक्का की पुत्री थी। उनकी मूर्ति, अनुष्ठानों के अनुसार, मेदाराम के पास एक छोटे से गांव कन्नेपल्ली के एक मंदिर में स्थापित है।
