1985 का बिहार विधानसभा चुनाव राजनीतिक दृष्टि से एक ऐतिहासिक मोड़ था। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देशभर में फैली संवेदनशीलता और सहानुभूति की लहर ने कांग्रेस को एक बार फिर सत्ता के शिखर पर पहुंचा दिया। बिहार भी इससे अछूता नहीं रहा। जनता, जिसने 1980 के दशक की शुरुआत में अस्थिरता और बेरोजगारी का दौर देखा था, अब एक बार फिर स्थिर शासन और विकास की उम्मीदों के साथ कांग्रेस के पक्ष में खड़ी हुई। लेकिन इस जीत के पीछे की कहानी केवल सत्ता की वापसी नहीं, बल्कि समाज में उठते नए राजनीतिक और सामाजिक भूचालों की भी थी।
कांग्रेस का जनादेश – संख्या में बड़ी, मन में कमजोर जीत
1985 में कुल 324 सीटों के लिए मतदान हुआ। कांग्रेस (INC) ने भारी बहुमत के साथ 196 सीटें जीतीं, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि जनता अब भी स्थिर शासन की पक्षधर थी।
हालांकि, यह जीत 1972 या 1980 जैसी भावनात्मक नहीं थी — यह अधिक एक ‘विश्वास का आखिरी अवसर’ था जो जनता ने कांग्रेस को दिया।
विपक्ष में लोकदल (LK) ने 46 सीटें, भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने 16 सीटें, और जनता पार्टी (JP) ने 13 सीटें हासिल कीं।
वामपंथी दलों का प्रदर्शन भी उल्लेखनीय रहा — भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) ने 12 सीटें, झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) ने 9 सीटें, और CPI(M), IC(S), SUCI(C) को क्रमशः 1-1 सीट मिली।
इसके अलावा 29 निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी जीत दर्ज की, जो इस बात का संकेत था कि जनता अब पार्टी से ज्यादा व्यक्ति-आधारित राजनीति पर भरोसा दिखा रही है।
जिलावार नतीजे – कांग्रेस का आधा अधूरा प्रभुत्व
पटना जिले की 14 सीटों में कांग्रेस ने 10 पर कब्जा किया, जबकि BJP ने 2 और लोकदल ने 1 सीट जीती।
दरभंगा और मधुबनी जैसे मिथिलांचल के परंपरागत कांग्रेस गढ़ों में भी पार्टी ने मजबूत वापसी की — दरभंगा की 12 में से 8 और मधुबनी की 10 में से 7 सीटें कांग्रेस के खाते में गईं।
भागलपुर, मुंगेर, और कटिहार जैसे सीमांचल और अंग क्षेत्र के जिलों में कांग्रेस ने लगभग 70% सीटें अपने नाम कीं।
लेकिन चंपारण, सीवान, सारण, और भोजपुर जैसे जिलों में कांग्रेस की पकड़ ढीली दिखी।
यहां लोकदल और BJP ने संयुक्त रूप से कांग्रेस के सामने एक नए वैकल्पिक समीकरण की झलक दी।
गया, औरंगाबाद और रोहतास जिलों में भी CPI और JMM के प्रभाव से कांग्रेस की सीटें कम हुईं।
यह स्पष्ट था — कांग्रेस जीती थी, पर हर जिले में उसकी पकड़ पहले जैसी एकतरफा नहीं रही।
मुख्यमंत्री बदलते रहे, दिशा खोती रही सरकार
कांग्रेस की इस विशाल जीत के बाद बिहार ने चार-चार मुख्यमंत्री देखे — बिंदेश्वरी दुबे, भगवत झा आजाद, सत्येन्द्र नारायण सिंह, और अंत में फिर जगन्नाथ मिश्रा ।
लगातार बदलते नेतृत्व ने जनता को असमंजस में डाल दिया।
बिंदेश्वरी दुबे ने विकास योजनाओं पर जोर दिया, भगवत झा आजाद ने शिक्षा और स्वास्थ्य सुधारों की नींव रखी, जबकि सत्येन्द्र नारायण सिंह और मिश्रा ने प्रशासनिक सुधारों की कोशिश की लेकिन कोई भी दीर्घकालिक नीति या दृष्टि नहीं दे सका।
सरकार स्थिर थी, पर दिशा विहीन।
विकास की बातें, लेकिन जमीनी हकीकत अलग
दुबे और आजाद सरकार ने ग्रामीण इलाकों में नहरों, सड़कों और स्कूलों के विस्तार का दावा किया।
ग्रामीण बैंकिंग, बिजली और सिंचाई परियोजनाओं पर करोड़ों रुपये खर्च हुए।
लेकिन नीतियों और क्रियान्वयन के बीच की दूरी जस की तस रही।
कई जिलों में योजनाएं शुरू तो हुईं, पर भ्रष्टाचार, ठेकेदारी और अफसरशाही के जाल में फंसकर अधूरी रह गईं।
युवा बेरोजगारी एक बड़ा सवाल बन चुकी थी, और पलायन अब बिहार की पहचान बनने लगा था।
राजनीति में बदलते समीकरण – मंडल युग की दस्तक
1985 का चुनाव केवल कांग्रेस की जीत की कहानी नहीं था, बल्कि भविष्य में आने वाले सामाजिक विस्फोट की प्रस्तावना भी था।
कर्पूरी ठाकुर की नीतियों से उपजे पिछड़ा वर्ग आंदोलन ने अब गहराई पकड़ ली थी।
ओबीसी और दलित समुदाय अब केवल वोट बैंक नहीं रहे वे सत्ता में भागीदारी की मांग कर रहे थे।
यह वही दौर था जब लालू प्रसाद यादव जैसे युवा नेताओं का उदय शुरू हुआ, जिन्होंने आने वाले वर्षों में बिहार की राजनीति की परिभाषा ही बदल दी।
जनता की भावना – थकान के साथ उम्मीद की आखिरी डोर
1985 का जनादेश एक विरोधाभास था — जनता ने कांग्रेस को भरोसा तो दिया, पर आंख मूंदकर नहीं।
लोग बदलाव चाहते थे, लेकिन डरते थे कि अस्थिरता फिर लौट आएगी।
इसलिए उन्होंने कांग्रेस को एक आखिरी अवसर दिया “विकास करो या रास्ता छोड़ो।”
लेकिन सरकार जनता की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर सकी।
भ्रष्टाचार, जातिगत राजनीति, और बेरोजगारी ने जनता के भरोसे की डोर कमजोर कर दी।
स्थिरता की वापसी, परिवर्तन की तैयारी
1985 का बिहार चुनाव कांग्रेस का अंतिम सुनहरा अध्याय था।
यह वह दौर था जब जनता ने स्थिरता के लिए मतदान किया, लेकिन भीतर ही भीतर एक सामाजिक क्रांति की आग सुलग रही थी।
आने वाले वर्षों में यही आग 1990 के दशक की ‘सामाजिक न्याय की राजनीति’ में बदल गई, जिसने बिहार की दिशा और दशा दोनों को हमेशा के लिए बदल दिया।
बिहार ने 1985 में कांग्रेस को अंतिम बार वह सम्मान दिया, जो स्वतंत्र भारत के शुरुआती दशकों में उसका अधिकार था लेकिन यह जीत एक शांत तूफान थी, जो अगले दशक में जनता के विस्फोट का कारण बनने वाली थी।
