इतिहास रचता बिहार: 64.66% की रिकॉर्ड वोटिंग, लोकतंत्र का नया पर्व

बिहार ने 2025 के विधानसभा चुनाव के पहले चरण में 64.66% की ऐतिहासिक वोटिंग दर्ज की है — यह राज्य के इतिहास में अब तक की सबसे अधिक मतदान दर है। पहले का रिकॉर्ड 2000 के चुनाव में 62.57% था। इस बार 121 सीटों पर वोटिंग हुई, जबकि बाकी 122 सीटों पर 11 नवंबर को मतदान होगा और नतीजे 14 नवंबर को घोषित किए जाएंगे।
मुख्य निर्वाचन आयुक्त ग्यानेश कुमार ने इस अभूतपूर्व भागीदारी के लिए बिहार की जनता और मतदान कर्मियों को धन्यवाद दिया। इस बार के आंकड़े दिखाते हैं कि जनता न केवल उत्साहित है, बल्कि सत्ता परिवर्तन या पुनःस्थापना को लेकर गहराई से सोच रही है।

वोटर लिस्ट विवाद के बीच बढ़ा मतदान, लेकिन एक नया सवाल भी उठा

चुनाव आयोग के विशेष मतदाता सूची संशोधन (SIR) के दौरान 47 लाख नाम हटाए गए — जिससे कुल मतदाताओं की संख्या 7.89 करोड़ से घटकर 7.42 करोड़ रह गई। विपक्ष का आरोप है कि यह संशोधन गरीब और हाशिए पर रहे तबकों को मताधिकार से वंचित करने की कोशिश थी, जो पारंपरिक रूप से महागठबंधन (RJD–INC–Left) का वोट बैंक माने जाते हैं।
इससे मतदाता संख्या घटने के बावजूद प्रतिशत बढ़ा — यानी कुल वोटों का अनुपात ज़्यादा दिखा, पर यह स्पष्ट नहीं कि वास्तविक वोटर संख्या भी बढ़ी या नहीं।
विश्लेषक मानते हैं कि इस बार अधिक मतदान या तो जनता की नाराज़गी को दर्शाता है या फिर गहरे राजनीतिक ध्रुवीकरण को।

नीतीश–तेजस्वी के बीच सीधी टक्कर: 121 सीटों पर पहली परीक्षा

पहले चरण की 121 सीटों में उत्तर बिहार और मगध के ज़िले प्रमुख रहे — जैसे पटना, नालंदा, गया, समस्तीपुर, मधुबनी, सिवान, दरभंगा, बक्सर और मुजफ्फरपुर।
इन जिलों में पिछली बार (2020) एनडीए को 68 सीटें मिली थीं जबकि महागठबंधन ने 53 सीटें जीती थीं। इस बार RJD के नेतृत्व में विपक्ष ने “हर घर नौकरी” का नारा दिया है, जिसने युवा मतदाताओं में गहरी पैठ बनाई है।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू (JDU) की प्रतिष्ठा भी दांव पर है, खासकर उन जिलों में जहां 2020 में पार्टी को भारी नुकसान हुआ था — जैसे गया, मुजफ्फरपुर, और दरभंगा।

पिछले नतीजों की झलक: NDA की जीत लेकिन घटता जनाधार

2020 में 243 सीटों में से NDA ने 125, महागठबंधन ने 110, और अन्य ने 8 सीटें जीती थीं। इनमें BJP के 74, JDU के 43, RJD के 75, और कांग्रेस के 19 विधायक चुने गए थे।
गया, औरंगाबाद, भोजपुर जैसे जिलों में NDA का मजबूत प्रदर्शन रहा था, जबकि पूर्णिया, कटिहार, मधेपुरा और सीवान जैसे जिलों में RJD ने बढ़त बनाई थी।
हालांकि नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने, लेकिन वे “जूनियर पार्टनर” की भूमिका में आ गए — BJP को उनसे ज़्यादा सीटें मिली थीं। यही कारण है कि 2025 में NDA के भीतर सत्ता संतुलन को लेकर तनाव पहले से ही बढ़ा हुआ है।

महागठबंधन का नया दांव: “हर घर नौकरी” और युवाओं का भरोसा

तेजस्वी यादव इस चुनाव में विपक्ष के पोस्टर बॉय हैं। उन्होंने अपनी पारंपरिक सीट राघोपुर से नामांकन किया है, जहाँ उनके पिता लालू यादव और माँ राबड़ी देवी ने पिछले नौ में से सात बार जीत दर्ज की है।
तेजस्वी इस बार “रोज़गार” को केंद्र में रखकर चुनाव लड़ रहे हैं — उनका वादा है कि “हर परिवार में एक सरकारी नौकरी” दी जाएगी।
वहीं कांग्रेस और वामपंथी दलों के साथ गठबंधन कर उन्होंने अपने सामाजिक समीकरण को और मजबूत किया है — यादव–मुस्लिम–दलित गठजोड़ के साथ-साथ अब युवाओं और महिलाओं पर भी फोकस है।

NDA की रणनीति: सुशासन और स्थिरता पर जोर

दूसरी ओर, NDA में BJP के सम्राट चौधरी, जेडीयू के अनंत सिंह और नए चेहरे मैथिली ठाकुर जैसे उम्मीदवार चर्चा में हैं।
तरापुर, आलिनगर, और मोकामा जैसे हाई-प्रोफाइल क्षेत्रों में मुकाबला बेहद दिलचस्प रहा। मोकामा में तो जेडीयू प्रत्याशी अनंत सिंह की गिरफ्तारी ने चुनावी माहौल को और तीखा बना दिया।
NDA इस बार “विकास और स्थिरता” के मुद्दे पर मैदान में है — लेकिन युवाओं की बेरोजगारी, बढ़ती महंगाई और सुशासन मॉडल की थकान ने उनकी चुनौती बढ़ा दी है।

क्या रिकॉर्ड वोटिंग का मतलब बदलाव है?

राजनीतिक परंपरा कहती है कि उच्च मतदान दर अक्सर सत्ता-विरोधी लहर का संकेत होती है — पर यह हमेशा सही नहीं।
उदाहरण के तौर पर छत्तीसगढ़ (2008–2013) और मध्य प्रदेश (2003–2013) में भी जब वोट प्रतिशत बढ़ा, तब भी सत्ता पार्टी ने दोबारा जीत हासिल की।
फिर भी बिहार का इतिहास बताता है कि जब जनता 60% से अधिक मतदान करती है, तो सत्ता में परिवर्तन देखने को मिलता है — जैसे 1990, 2005, और 2015 में हुआ था।

2025 का चुनाव: हर सीट पर बदलता समीकरण

इस बार बिहार के 243 विधानसभा क्षेत्रों में हर जिला एक कहानी कह रहा है।
जहाँ उत्तर बिहार में जातीय समीकरण निर्णायक रहेंगे, वहीं मगध और दक्षिण बिहार में विकास और रोजगार सबसे बड़ा मुद्दा है।
पूर्वी बिहार में प्रवासी श्रमिकों और किसानों की नाराज़गी NDA के खिलाफ जा सकती है, जबकि पटना और नालंदा जैसे शहरी जिलों में सरकार के “स्थिर शासन” का असर दिख सकता है।

जनता बोलेगी, बिहार दिशा तय करेगा

2025 का चुनाव बिहार के लिए सिर्फ एक और राजनीतिक उत्सव नहीं, बल्कि यह तय करेगा कि जनता परिवर्तन चाहती है या निरंतरता।
इतिहास गवाह है — जब बिहार की जनता ज्यादा संख्या में बाहर निकलकर वोट करती है, तो कोई न कोई नई राजनीतिक कहानी जन्म लेती है।
क्या इस बार यह कहानी तेजस्वी यादव के नए उभार की होगी या नीतीश–BJP गठबंधन की वापसी की?
14 नवंबर को आने वाले नतीजे तय करेंगे कि लोकतंत्र की यह प्रयोगशाला अब किस दिशा में आगे बढ़ेगी — जाति की राजनीति की ओर या जनहित के नए युग की ओर।