दिल्ली में 10 नवंबर को हुए लाल किला मेट्रो स्टेशन ब्लास्ट की जांच में अब देश को झकझोर देने वाला खुलासा हुआ है। सूत्रों के अनुसार, आतंकियों की योजना देशभर में 32 कारों में बम लगाकर एक साथ धमाके करने की थी। लाल किला के पास विस्फोट में इस्तेमाल की गई आई20 कार इसी “सीरियल रिवेंज अटैक” का हिस्सा थी। इस भयावह योजना का उद्देश्य 6 दिसंबर यानी बाबरी मस्जिद विध्वंस की बरसी को देशभर में तबाही मचाकर “बदला लेने” का था। जांच एजेंसियों ने अब तक चार कारें बरामद की हैं जिनमें ब्रेज़ा, स्विफ्ट डिज़ायर, इकोस्पोर्ट और i20 जैसी गाड़ियाँ शामिल हैं।

13 मौतें, 20 घायल: लाल किले के पास हिला देने वाला धमाका

दिल्ली के लाल किला मेट्रो स्टेशन के पास हुए इस धमाके में अब तक 13 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 20 से अधिक लोग घायल हैं। चश्मदीदों के मुताबिक, धमाका इतना तेज था कि पास खड़ी गाड़ियाँ आग की लपटों में समा गईं। CCTV फुटेज में ब्लास्ट वाली कार को रिक्शा के पीछे खड़ा देखा गया। गुरुवार सुबह एक और घायल की मौत के बाद मृतकों की संख्या बढ़ गई। केंद्र सरकार ने इस हमले को आतंकी हमला मानते हुए कैबिनेट मीटिंग में टेरर अटैक पर प्रस्ताव पारित किया है।

फरीदाबाद से मिली दूसरी कार, आतंकियों की गतिविधियों का बड़ा सुराग

धमाके के बाद जांच टीम को एक औरबुधवार शाम फरीदाबाद के खंदावली गांव से एक लाल इकोस्पोर्ट कार बरामद हुई। मौके से एक संदिग्ध को हिरासत में लिया गया। NSG की बॉम्ब स्क्वाड टीम ने कार की जांच शुरू कर दी है। सूत्रों के अनुसार, यह कार उमर नबी के ड्राइवर की बहन के घर के पास खड़ी थी। पुलिस को शक है कि यह भी धमाकों की श्रृंखला में इस्तेमाल होनी थी। इस बरामदगी के बाद दिल्ली, हरियाणा और यूपी में हाई अलर्ट जारी किया गया है।

पहला खुलासा: जनवरी से हो रही थी लाल किले की रेकी

जांच में सामने आया कि आतंकियों ने जनवरी से ही लाल किले की सुरक्षा व्यवस्था और भीड़ के पैटर्न की निगरानी शुरू कर दी थी। फरीदाबाद की अल फलाह यूनिवर्सिटी के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. मुजम्मिल गनी और कथित रूप से मारे गए डॉ. उमर नबी ने कई बार लाल किला क्षेत्र का दौरा किया था। पुलिस को संदेह है कि उनकी शुरुआती योजना 26 जनवरी पर हमला करने की थी, जो किसी कारण से टल गई। इसके बाद उन्होंने 6 दिसंबर को निशाना बनाने का प्लान बनाया।

दूसरा खुलासा: डॉक्टरों का नेटवर्क बना व्हाइट कॉलर टेरर मॉड्यूल

दिल्ली पुलिस ने बताया कि इस साजिश का मास्टरमाइंड फरीदाबाद स्थित अल फलाह यूनिवर्सिटी से जुड़े डॉक्टरों का समूह था। गिरफ्तार 8 आरोपियों में से 6 डॉक्टर हैं, जो उच्च शिक्षित और तकनीकी ज्ञान वाले हैं। इनका केंद्र फरीदाबाद था और इनका मकसद “शिक्षा के आवरण में आतंकी तंत्र खड़ा करना” था। श्रीनगर का रहने वाला डॉ. निसार, जो डॉक्टर्स एसोसिएशन ऑफ कश्मीर का अध्यक्ष था, फरार है। जम्मू-कश्मीर सरकार ने उसे बर्खास्त कर दिया है।

तीसरा खुलासा: खाद के नाम पर जुटाया गया विस्फोटक सामग्री

गनी और उसके साथियों ने NPK फर्टिलाइज़र, अमोनियम नाइट्रेट और अन्य रसायनों को “खाद” बताकर जमा किया। पड़ोसियों ने जब पूछा कि बोरियों में क्या है, तो गनी ने कहा “कृषि प्रयोग के लिए है, कश्मीर ले जाना है।” जांच में पता चला कि ये 20 क्विंटल से अधिक विस्फोटक सामग्री थी। पुलिस ने उस कमरे से CCTV फुटेज बरामद किए हैं जहाँ गनी और उसके साथी अक्सर आते-जाते थे।

ED की एंट्री: टेरर फंडिंग की गुत्थी सुलझाने की कोशिश

अब इस केस में प्रवर्तन निदेशालय (ED) भी शामिल हो गई है। एजेंसी इस बात की जांच कर रही है कि आतंकियों ने विस्फोटक खरीदने के लिए 23 लाख रुपए कहाँ से जुटाए।
ED को शक है कि यह रकम हवाला और NGO फंडिंग के जरिए लाई गई थी। अल फलाह यूनिवर्सिटी के वित्तीय लेनदेन की जांच भी शुरू कर दी गई है।

इंटरपोल से मदद, अल फलाह यूनिवर्सिटी के मुख्यालय पर छापा

जम्मू-कश्मीर पुलिस ने फरार आतंकी डॉ. मुजफ्फर के खिलाफ इंटरपोल से रेड कॉर्नर नोटिस जारी करने की मांग की है। इधर दिल्ली पुलिस ने ओखला स्थित अल फलाह यूनिवर्सिटी के हेडक्वार्टर पर छापा मारा है। यूनिवर्सिटी ने NAAC के शोकॉज नोटिस मिलने के बाद अपनी वेबसाइट बंद कर दी है। इससे जांच एजेंसियों को शक है कि कई अहम डिजिटल साक्ष्य मिटाए जा रहे हैं।

16 साल पुरानी गूंज: 2009 में भी श्रीलंकाई टीम पर हमला हुआ था

इस हमले की प्रकृति ने 2009 की याद ताजा कर दी जब लाहौर में श्रीलंकाई क्रिकेट टीम की बस पर TTP आतंकियों ने हमला किया था। अब, उसी संगठन से जुड़े डिजिटल चैनल्स पर “बाबरी रिवेंज” के नारे देखे जा रहे हैं। यह इंगित करता है कि आतंकवाद अब धार्मिक प्रतीकों और ऐतिहासिक घटनाओं को भड़काने का हथियार बना चुका है, जिसका मकसद पूरे देश में नफरत फैलाना है।

राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों की चुनौती: शिक्षा और आतंक का खतरनाक गठजोड़

यह केस केवल एक आतंकी हमले की कहानी नहीं, बल्कि भारत के लिए नई किस्म के आतंकी खतरे का संकेत है जहाँ बम बनाने वाले डॉक्टर, प्रोफेसर और शोधकर्ता हैं।
ऐसे मॉड्यूल न केवल सुरक्षा एजेंसियों को चुनौती दे रहे हैं, बल्कि शिक्षा संस्थानों की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं। अब देशभर की एजेंसियों को ऐसे मॉड्यूल की पहचान और निगरानी के लिए एकजुट रणनीति बनानी होगी। दिल्ली का यह ब्लास्ट महज़ एक हादसा नहीं था, यह चेतावनी थी कि आतंक का चेहरा अब “वर्दी और दाढ़ी” से बदलकर “कोट और लैपटॉप” में छिपा है।