सत्ता संघर्ष की अटकलों के बीच एकजुटता का बड़ा संदेश
कर्नाटक की राजनीति में पिछले कई हफ्तों से चल रही पावर टसल, रोटेशनल CM फॉर्मूले और नेतृत्व परिवर्तन की खबरों के बीच मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार एक बार फिर एक मंच पर आए और इस बार पहले से भी ज्यादा मजबूती के साथ। दोनों नेताओं ने चार दिनों में दूसरी बार संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस की और इससे यह स्पष्ट कर दिया कि वे किसी भी स्थिति में एक-दूसरे के खिलाफ खेमेबाज़ी की छवि नहीं बनाना चाहते। सिद्धारमैया और शिवकुमार एक-दूसरे के बगल में बैठे, हंसते हुए संवाद साझा किया और लगातार इस बात को दोहराते रहे कि कर्नाटक कांग्रेस में किसी तरह का मतभेद नहीं है। यह तस्वीरें ऐसे समय आईं जब राज्य में राजनीतिक तापमान बढ़ा हुआ है, विधायक दिल्ली के चक्कर लगा रहे हैं और पार्टी के भीतर से ही नेतृत्व परिवर्तन की फुसफुसाहट तेज हो चुकी थी। इस पूरी परिस्थिति में दोनों नेताओं का साथ आकर कहना “अगर हाईकमान बुलाएगा, तो हम दोनों तुरंत दिल्ली जाएंगे” एक राजनीतिक संदेश से कहीं अधिक है। यह एक भरोसा है जो वे हाईकमान, विधायकों और जनता सभी को दिलाना चाहते थे।
हाईकमान की ही चलेगी, दिल्ली बुलावा आया तो दोनों तैयार
ब्रेकफ़ास्ट मीटिंग के बाद मीडिया से बात करते हुए सिद्धारमैया ने साफ कहा कि कांग्रेस हाईकमान का हर फैसला उनके लिए अंतिम है। उन्होंने कहा कि अगर राहुल गांधी, सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी या पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे उन्हें दिल्ली बुलाते हैं, तो वे बिना किसी देरी के तुरंत पहुंच जाएंगे। यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बीते कुछ दिनों से कांग्रेस के भीतर यह चर्चा फैल चुकी थी कि हाईकमान कर्नाटक सरकार में बड़ा बदलाव करने की सोच रहा है। सिद्धारमैया ने यह भी बताया कि 8 दिसंबर को सांसदों की बैठक बुलाई गई है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया कि उसमें नेतृत्व से जुड़ा कोई मुद्दा उठेगा या नहीं। उन्होंने लगातार इस बात पर जोर दिया कि फिलहाल पार्टी का फोकस किसानों की समस्याओं, राज्य की अर्थव्यवस्था और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों पर है। दोनों नेताओं की यह टिप्पणी इस बात का संकेत भी है कि वे सार्वजनिक रूप से किसी भी प्रकार की टकराव की संभावना को खत्म करना चाहते हैं और हाईकमान को यह भरोसा दिलाना चाहते हैं कि कर्नाटक सरकार फिलहाल स्थिर है।
ढाई साल पूरे होते ही ‘रोटेशनल CM’ मॉडल की चर्चाएं तेज
कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2023 के बाद जिस तरह कांग्रेस के भीतर मुख्यमंत्री पद पर लंबी खींचतान चली थी, उसने ही आगे के राजनीतिक समीकरण की बुनियाद रख दी थी। पार्टी हाईकमान ने तब सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री और डीके शिवकुमार को डिप्टी CM बनाकर एक समझौता किया, लेकिन उस समय से ही चर्चाएं चल रही थीं कि यह समझौता ढाई-ढाई साल के रोटेशनल मॉडल पर आधारित है। पिछले महीने सिद्धारमैया के ढाई साल का कार्यकाल पूरा होते ही यह मुद्दा फिर से जोर पकड़ने लगा। शिवकुमार के समर्थक खुलकर यह कहने लगे कि अब उनकी बारी है। इस बीच शिवकुमार का प्रदेश अध्यक्ष पद छोड़ने के संकेत देना और उनके समर्थकों का दिल्ली कैंप करना राजनीतिक गलियारों में इस बात की पुष्टि की तरह देखा गया कि कोई बड़ी हलचल होने वाली है। हालांकि, पार्टी ने कभी इस फॉर्मूले की आधिकारिक घोषणा नहीं की, लेकिन नेताओं की गतिविधियों और राजनीतिक माहौल ने इसे एक वास्तविक संभावना की तरह प्रस्तुत कर दिया था।
दो नाश्ते, दो नेताओं की मुस्कान और पिघलती दूरियां
राजनीति में संकेत अक्सर शब्दों से ज्यादा प्रभावशाली होते हैं और पिछले दो दिनों में हुई दो ब्रेकफ़ास्ट मीटिंग्स ने यही साबित किया। शनिवार को सिद्धारमैया शिवकुमार के घर नाश्ते पर गए थे। आज सुबह शिवकुमार खुद मुख्यमंत्री को अपने घर नाश्ते पर ले आए। दोनों नेताओं की यह अनौपचारिक मुलाकातें सिर्फ सोशल मीडिया के लिए तस्वीरें भर नहीं थीं। इनके पीछे एक स्पष्ट संदेश था कि दोनों नेता संवाद के लिए तैयार हैं, बात करने को तैयार हैं और किसी भी गलतफहमी को बढ़ने नहीं देना चाहते। शिवकुमार ने कहा “हम भाई हैं, हम साथ काम कर रहे हैं।” वहीं सिद्धारमैया ने इसे सामान्य राजनीतिक बातचीत बताया। इन मुलाकातों ने राजनीतिक हलकों में यह संदेश दे दिया कि चाहे अंदरूनी हलचल हो या नहीं, दोनों नेता सार्वजनिक रूप से एक-दूसरे के खिलाफ खड़े होने को तैयार नहीं हैं।
भाजपा की नजरें कर्नाटक मॉडल पर, कांग्रेस में बढ़ी बेचैनी
कर्नाटक कांग्रेस दो साल से अपनी सरकार को सबसे स्थिर मॉडल के तौर पर पेश करती रही है। पार्टी के लिए यह सरकार दक्षिण भारत में उसकी पकड़ को मजबूत करती है और राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका निभाती है। इसलिए किसी भी तरह की कलह कांग्रेस के लिए एक बड़ा झटका साबित हो सकती है। भाजपा लगातार कह रही थी कि कर्नाटक सरकार भीतर से टूटी हुई है और सिर्फ दिखावे की एकता दिखाई जा रही है। ऐसे में आज की संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस और नाश्ते की राजनीति भाजपा के इन दावों का जवाब भी मानी जा रही है। कांग्रेस चाहती है कि वह आने वाले लोकसभा उपचुनावों और संगठनात्मक बदलावों से पहले यह सुनिश्चित कर ले कि कर्नाटक में राजनीतिक स्थिरता बनी रहे, ताकि वह राष्ट्रीय स्तर पर मजबूती से खड़ी हो सके।
नेतृत्व नहीं, मुद्दों पर ध्यान: किसानों और अर्थव्यवस्था पर बैठक की तैयारी
सिद्धारमैया ने जोर देकर कहा कि 8 दिसंबर की बैठक में किसानों की समस्याओं, बाढ़ और सूखे की स्थिति, राज्य की वित्तीय चुनौतियों, बिजली संकट और विकास योजनाओं पर गंभीर चर्चा होगी। उन्होंने इस बात को दोहराया कि नेतृत्व परिवर्तन फिलहाल किसी की प्राथमिकता नहीं है। कर्नाटक पिछले कुछ महीनों से कृषि संकट से जूझ रहा है। गन्ना किसानों के भुगतान अटके हुए हैं, बारिश ने कई जिलों में फसलें नुकसान पहुंचाई हैं और बेल्टों में बिजली कटौती ने जनता को परेशान किया है। इन मुद्दों को देखते हुए सरकार पर पहले ही कामकाज तेज करने का दबाव बढ़ा है। सिद्धारमैया यह भी जानते हैं कि अगर सरकार मुद्दों से भटकी, तो विपक्ष इस पूरे नेतृत्व विवाद को जनता के सामने सरकार की नाकामी की तरह पेश कर सकता है।
कर्नाटक की सत्ता में फिलहाल दिखाई देने वाली शांति एक सतही शांति है। दोनों नेता एकजुट दिख रहे हैं, लेकिन यह स्पष्ट है कि असली फैसला दिल्ली में होगा। फिलहाल कांग्रेस स्थिति को शांत रखने की रणनीति पर चल रही है लेकिन एक बात साफ है कि कर्नाटक की राजनीति आने वाले कुछ हफ्तों में राष्ट्रीय राजनीति का केंद्र बन सकती है और जनता की निगाहें अब दिल्ली की दिशा में टिकी हैं।
