पूर्व विधायक पंकज पुष्कर की ओर से दायर याचिका में यह आशंका व्यक्त की गई थी कि 10 नवंबर के रेड फोर्ट ब्लास्ट मामले का ट्रायल भी उसी तरह लंबा खिंच सकता है जैसे वर्ष 2000 के मामले में हुआ था, जिसे निपटाने में ट्रायल कोर्ट को सात वर्ष लगे थे। याचिकाकर्ता का दावा था कि इतने गंभीर मामलों में देरी न केवल पीड़ित परिवारों की पीड़ा बढ़ाती है बल्कि आरोपियों के संवैधानिक अधिकारों पर भी गहरा असर डालती है। उन्होंने मांग की कि एक विशेष निगरानी समिति बनाई जाए जो हर सुनवाई की प्रगति देखे और छह महीने में ट्रायल पूरा करने का आदेश दे। अदालत ने विस्तार से यह स्पष्ट किया कि भविष्य की स्थिति पर आधारित आशंका को न्यायिक हस्तक्षेप का आधार नहीं बनाया जा सकता, इसलिए यह मांग स्वीकार्य नहीं है।
ट्रायल शुरू न होने के चलते कोर्ट का मानना, न्यायिक हस्तक्षेप तभी जब ठोस तथ्य मौजूद हों
मुख्य न्यायाधीश डी. के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तुषार राव गेदेला की बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि अदालत किसी अनुमान, संभावना या चिंता के आधार पर निर्देश जारी नहीं कर सकती। उनका कहना था कि याचिका गहन भावनात्मक और साहित्यिक भाषा में लिखी गई है लेकिन कानूनी रूप से यह पर्याप्त नहीं है। कोर्ट ने कहा कि अभी चार्जशीट पर विचार तक शुरू नहीं हुआ, इसलिए ट्रायल को पहले ही विलंबित मानकर अदालत से हस्तक्षेप की उम्मीद करना न्यायिक सिद्धांतों के अनुकूल नहीं होगा। अदालत ने यह भी कहा कि न्यायपालिका का उद्देश्य जांच एजेंसियों की कार्यवाही को बाधित करना नहीं बल्कि वास्तविक अधिकार हनन की स्थिति में हस्तक्षेप करना है।
NIA को मिली जांच की जिम्मेदारी और केंद्र का आश्वासन कि कार्रवाई समयसीमा के भीतर होगी
केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने अदालत को बताया कि इस विस्फोट की गंभीरता और संदिग्ध आतंकी पृष्ठभूमि को देखते हुए जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी NIA को सौंप दी गई है। उन्होंने कहा कि एजेंसी UAPA के तहत तय कड़े प्रावधानों और आधुनिक जांच पद्धतियों के साथ आगे बढ़ रही है जिसमें डिजिटल फॉरेंसिक की मदद, विस्फोटक की संरचना का वैज्ञानिक विश्लेषण और देशभर में फैले संभावित मॉड्यूल की पहचान जैसे कई संवेदनशील चरण शामिल हैं। केंद्र ने यह भरोसा दिलाया कि NIA के पास पर्याप्त साधन और अधिकार हैं जिससे जांच में अनावश्यक देरी की संभावना बेहद कम हो जाती है और पूरी प्रक्रिया पारदर्शी और तेजी से आगे बढ़ेगी।
दिल्ली के व्यस्त सिग्नल पर उस समय अचानक जोरदार धमाका हुआ जब ट्रैफिक सामान्य रूप से आगे बढ़ रहा था और आसपास बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे। चोरी की गई एक कार में फिट किए गए शक्तिशाली आईईडी ने कुछ ही सेकंड में पूरे इलाके को हिला दिया। 12 लोगों की मौत हुई और कई घायल हुए। प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि मौके पर धुएं का घना बादल छा गया और आसपास के वाहनों के टुकड़े दूर तक बिखर गए। दुकानों के शटर टूट गए, सड़क किनारे खड़े लोग दहशत में इधर उधर भागने लगे और कुछ ही मिनटों में पुलिस और आपदा प्रतिक्रिया टीमें वहां पहुंच गईं। प्रारंभिक जांच से यह भी स्पष्ट हुआ कि विस्फोटक पेशेवर तरीके से तैयार किया गया था और कार हाल ही में चोरी की गई थी, जिसने इस हमले की संभावित आतंकी प्रकृति को और मजबूत किया। राजधानी की सुरक्षा व्यवस्था पर इस विस्फोट ने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया और पूरे शहर में सुरक्षा बढ़ा दी गई।
अदालत ने याचिका वापस लेने की अनुमति दी और निगरानी की मांग को अनुचित करार दिया
जब अदालत ने संकेत दिया कि वह इस याचिका को खारिज कर सकती है, तब याचिकाकर्ता के वकील ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया। साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि यदि भविष्य में वास्तव में किसी स्तर पर देरी साबित होती है या किसी आरोपी के मौलिक अधिकारों का हनन होता है तो संबंधित पक्ष अदालत का रुख कर सकते हैं। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि केवल आशंका की बुनियाद पर निगरानी समिति बनाने जैसा आदेश न्यायिक परंपरा और संतुलन के विरुद्ध है। अदालत के अनुसार इस स्तर पर हस्तक्षेप करना जांच और ट्रायल प्रक्रिया के स्वायत्त स्वरूप को प्रभावित कर सकता है इसलिए याचिका में मांगा गया उपाय उचित नहीं माना जा सकता।
