महाराष्ट्र में पांच साल बाद स्थानीय निकाय चुनावों का पहला चरण शुरू होते ही पूरा राजनीतिक परिदृश्य बेहद संवेदनशील हो गया है। सत्ता पक्ष महायुति और विपक्षी महाविकास अघाड़ी के भीतर चल रही खींचतान ने इस चुनाव की अहमियत कई गुना बढ़ा दी है। नेताओं के तीखे बयान, आरोप–प्रत्यारोप की आक्रामक राजनीति और भीतर ही भीतर बढ़ते अविश्वास के कारण यह चुनाव सिर्फ स्थानीय स्तर का न रहकर एक बड़ी राजनीतिक लड़ाई में बदल गया है। चुनाव प्रक्रिया में देरी, OBC आरक्षण विवाद और आयोग के कदमों पर उठते सवालों ने माहौल को और अधिक अस्थिर किया है। इसके साथ ही, पहली बार इतने लंबे अंतराल के बाद हो रहे इन चुनावों को लेकर जनता में भी उत्सुकता और बेचैनी दोनों हैं, जिससे मतदान का यह चरण राज्य की आगामी राजनीति का संकेतक बनने जा रहा है।

चुनाव स्थगन से बढ़ा विवाद, सरकार और विपक्ष दोनों का आयोग पर हमला

पहला चरण 246 नगर परिषदों और 42 नगर पंचायतों में होना था, परंतु अब केवल 222 निकायों में मतदान होगा, जबकि 76 नगर परिषदों के 154 वार्डों को 20 दिसंबर तक टाल दिया गया है। यह निर्णय तब आया जब महाराष्ट्र राज्य चुनाव आयोग को चिह्न आवंटन प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताओं का संदेह हुआ। आयोग के अनुसार, कई उम्मीदवारों की अपीलें समय पर न निपटने के कारण उन्हें तय समय पर नाम वापसी का वैधानिक अवसर नहीं मिल सका। इस अचानक किए गए बदलाव से सभी दलों में नाराजगी फैल गई है। दलों का कहना है कि यह निर्णय न केवल प्रत्याशियों की तैयारियों पर असर डालता है बल्कि जनता के विश्वास को भी कमजोर करता है, क्योंकि मतदान में देरी से राजनीतिक माहौल और भी ध्रुवीकृत हो सकता है।

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने सार्वजनिक रूप से कहा कि निर्वाचन आयोग ने कानूनों की “गलत व्याख्या” की है और उन्हें समझ नहीं आ रहा कि आयोग किस अधिनियम के आधार पर चुनाव स्थगित कर रहा है। फडणवीस का यह बयान न केवल राज्य में शासन बनाम आयोग की खींचतान को उजागर करता है, बल्कि प्रशासनिक ढांचे पर गंभीर सवाल उठा देता है। बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष रविंद्र चव्हाण ने इस निर्णय को “अनुचित” बताते हुए आयोग को पत्र भी भेजा। वहीं कांग्रेस ने इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था के साथ खिलवाड़ बताते हुए कहा कि आयोग इतने बड़े चुनाव को निष्पक्ष रूप से कराने में सक्षम दिखाई नहीं देता। कांग्रेस की दलील है कि अंतिम क्षण में किए गए बदलाव से न केवल मतदाताओं में भ्रम फैलता है, बल्कि कई जिलों में चुनावी तैयारियों को भी झटका लगता है।

कानूनी लड़ाइयों ने प्रक्रिया को और जटिल बनाया

2017 के बाद लंबे अंतराल से हो रहे इस चुनाव को लेकर पहले ही कई जटिलताएँ मौजूद थीं। OBC आरक्षण विवाद के कारण चुनाव टलते रहे और अंततः सुप्रीम कोर्ट ने मई में आदेश दिया कि 31 जनवरी 2026 तक चुनाव पूर्ण कराए जाएं। इस निर्देश के बाद भी कई याचिकाएँ दायर होती रहीं, जिनमें कहा गया कि कुछ निकायों में आरक्षण सीमा 50% से अधिक हो गई है। इन कानूनी उलझनों के चलते निर्वाचन आयोग को हर चरण में सावधानी से आगे बढ़ना पड़ा। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में स्पष्ट किया कि जहां-जहां आरक्षण सीमा पार हुई है, उन निकायों के चुनाव परिणाम उसके भविष्य के फैसले पर निर्भर रहेंगे। इस स्थिति ने न केवल प्रशासनिक स्तर पर असमंजस पैदा किया है, बल्कि उम्मीदवारों और मतदाताओं दोनों के बीच अनिश्चितता भी बढ़ा दी है।

महालगावों और गठबंधनों के भीतर बढ़ती दरारें

चुनाव ने राज्य की गठबंधन राजनीति का असली चेहरा सामने ला दिया है। महायुति गठबंधन में शामिल बीजेपी और एकनाथ शिंदे की शिवसेना कई जिलों में एक-दूसरे के आमने–सामने आ गई हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि सत्ता की साझेदारी के बावजूद ज़मीनी स्तर पर सहयोग उतना मजबूत नहीं है। सिंधुदुर्ग, सतारा, धाराशिव, पालघर और ठाणे जैसे जिलों में दोनों दलों के उम्मीदवार खुलकर भिड़ रहे हैं। दूसरी ओर, एनसीपी के दो गुट, अजित पवार और शरद पवार, जो राज्य की राजनीति में प्रतिद्वंद्वी बन चुके हैं, कोल्हापुर में साथ आते दिखाई दिए, जिससे स्थानीय समीकरण और जटिल हो गए हैं। कई जगहों पर कांग्रेस के स्थानीय नेताओं ने भी बीजेपी के साथ हाथ मिलाया है, जो चुनावी समीकरणों को और अप्रत्याशित बना रहा है।

विदर्भ में फिर सीधा मुकाबला, उच्च-स्तरीय प्रचार में बढ़ती तल्खी

विदर्भ क्षेत्र, जो मुख्यमंत्री फडणवीस का गढ़ माना जाता है, इस बार बीजेपी और कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर का केंद्र बन गया है। यहां बीजेपी ने 27 शहरों में उम्मीदवार उतारे हैं, जबकि कांग्रेस 22 स्थानों पर मैदान में है। इनमें से 18 शहरों में दोनों दल सीधे आमने–सामने हैं, जिससे मुकाबला बेहद रोचक बन गया है। शिवसेना, शिवसेना (UBT), एनसीपी (SP) और अजित पवार गुट भी कई सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं, जिनसे कई स्थानों पर त्रिकोणीय और चतुष्कोणीय मुकाबले बन गए हैं। फडणवीस ने खुद वरिष्ठ नेताओं की एक विशेष टीम यहां तैनात की है, जिससे यह साफ है कि भाजपा इस क्षेत्र में किसी भी सूरत में अपनी पकड़ कमजोर नहीं पडने देना चाहती।

जैसे-जैसे मतदान का दिन नजदीक आया, नेताओं के बीच जुबानी जंग और तेज होती गई। शिवसेना के भीतर और बाहर जारी आरोप–प्रत्यारोप ने गठबंधन धर्म को लेकर सवाल खड़े कर दिए, जिस पर मुख्यमंत्री शिंदे ने अपने साथियों को संयम बरतने की सलाह तक दे डाली। हालांकि, फडणवीस ने दावा किया कि महायुति इस चुनाव में 70% से 75% सीटों पर जीत हासिल करेगी। उधर विपक्ष में केवल कांग्रेस ही पूरे दमखम से प्रचार में उतरती दिखाई दी। महाविकास अघाड़ी के बड़े चेहरे, उद्धव ठाकरे और शरद पवार, अभियान से दूरी बनाए रहे, जबकि उनके दलों के स्थानीय नेता अपने-अपने क्षेत्र तक सीमित रहे।