दिल्ली में सियासी रात: 2 घंटे की गुप्त मीटिंग ने बदल दिए समीकरण
बिहार की नई सरकार के गठन से पहले दिल्ली में सोमवार देर रात राजनीति अपने चरम पर थी। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के सरकारी आवास पर हुई बंद कमरे की बैठक ने पटना की हवा बदल दी। यह मीटिंग करीब दो घंटे चली, जिसमें बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा, जदयू नेता ललन सिंह और संजय झा मौजूद रहे। बैठक को लेकर अंदर की खबरें बताती हैं कि सत्ता का खाका, मंत्रियों की संख्या, विभागों का बंटवारा, स्पीकर-डिप्टी स्पीकर से लेकर जातीय समीकरण तक हर मुद्दे पर गहन और कभी-कभी तीखी चर्चा हुई। यह पहली बार नहीं है जब NDA सरकार गठन से पहले दिल्ली ही थिंक-टैंक बनता है, मगर इस बार का दबाव ज्यादा है क्योंकि जदयू के बढ़े हुए आंकड़े ने BJP को भी नए संतुलन की तलाश पर मजबूर किया है।
स्पीकर पद का सबसे बड़ा विवाद: BJP के प्रेम कुमार बने केंद्र में
बैठक से बाहर आते ही एक नाम अचानक तेज़ी से तैरने लगा—प्रेम कुमार। बिहार के वरिष्ठ भाजपा नेता और लंबे राजनीतिक अनुभव वाले प्रेम कुमार मंगलवार को सुबह-सुबह पूर्व स्पीकर विजय सिन्हा से मिलने पहुंचे। इस मुलाकात ने सियासी गलियारों में आग लगा दी। ख़ास बात यह है कि JDU इस बार स्पीकर पद BJP को देने से पीछे हट रहा है। JDU का तर्क है “विधान परिषद का सभापति बीजेपी के पास है, इसलिए विधानसभा अध्यक्ष का पद हमें मिलेगा।” वहीं BJP का जवाब उतना ही स्पष्ट “सबसे बड़ी कुर्सी यानी मुख्यमंत्री का पद JDU के पास है, इसलिए स्पीकर पद हमारा होना ही स्वाभाविक है।”यानी स्पीकर की कुर्सी, जो अक्सर औपचारिक मानी जाती है, इस बार NDA सरकार की सबसे बड़ी पहेली बन चुकी है।
डिप्टी सीएम की कुर्सी पर RSS की नज़र: मंगल पांडेय की एंट्री
डिप्टी सीएम की दौड़ इस बार पहले से ज्यादा दिलचस्प हो गई है। BJP सूत्रों के मुताबिक विजय सिन्हा को हटाया जा सकता है और उनकी जगह RSS की पसंद माने जाने वाले मंगल पांडेय को डिप्टी सीएम बनाया जा सकता है। मंगल पांडेय का जमीनी नेटवर्क, संगठन के साथ तालमेल और स्वास्थ्य मंत्री के तौर पर उनका काम RSS और BJP हाईकमान को प्रभावित करता है। दूसरे डिप्टी सीएम के लिए सम्राट चौधरी फिर से नामांकन पा सकते हैं, हालांकि कुछ कैंप उन्हें बदलने के पक्ष में भी हैं।
कैबिनेट का गणित: ‘6 विधायक = 1 मंत्री’ का फॉर्मूला लागू
इस बार बिहार में मंत्रिमंडल गठन बिल्कुल पहले से तय फार्मूला पर होगा। NDA ने 6 विधायकों पर 1 मंत्री का आधार तय किया है यानी BJP और JDU दोनों से 15-15 मंत्री, LJP(R) से 3, HAM और RLN से 1-1 मंत्री बनाए जाएंगे। सबसे खास बात जिस पार्टी को विधानसभा स्पीकर की कुर्सी मिलेगी, उसका एक मंत्री पद कम कर दिया जाएगा।
यानी स्पीकर की लड़ाई सिर्फ प्रतिष्ठा नहीं, गिनती का खेल भी है। बिहार की राजनीति जातीय संतुलन से ही तय होती है। BJP इस बार राजपूत वोटबैंक को मजबूत करने के लिए दो नामों को प्राथमिकता दे रही है। त्रिविक्रम सिंह, औरंगाबाद के नए सितारे, दोनों दूसरी बार भारी मतों से जीतकर आए हैं और भाजपा इन्हें अगली पीढ़ी के नेतृत्व के तौर पर प्रोजेक्ट करने की रणनीति बना रही है। सहयोगी दलों में भी प्रतिनिधित्व तय है, HAM प्रमुख जीतन राम मांझी के बेटे संतोष मांझी दोबारा मंत्री बन सकते हैं, जबकि RLN की ओर से स्नेहलता कुशवाहा को पहली बार कैबिनेट में जगह मिलेगी।
JDU का भरोसा पुराने चेहरों पर कायम: 10 मंत्रियों की वापसी तय
जदयू की तरफ से बड़े फेरबदल की संभावना बेहद कम है। पिछले कार्यकाल के 13 मंत्रियों में से लगभग 10 को फिर से जिम्मेदारी मिलेगी। नीतीश कुमार यह संदेश देना चाहते हैं कि उनकी टीम स्थिर है, अनुभवी है और बार-बार बदलाव करके प्रशासनिक मशीनरी को कमजोर करने का इरादा नहीं है। BJP के मंत्रिमंडल में इस बार सबसे बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। राजस्थान और मध्य प्रदेश की तरहजहाँ नए मंत्रियों को बड़ी संख्या में मौका मिला वैसे ही बिहार में भी युवाओं और नए विधायकों को मौका मिलने की चर्चा है।
कई पुराने चेहरे बाहर हो सकते हैं। BJP यह संदेश देना चाहती है कि वह संगठन के समर्पित कार्यकर्ताओं को आगे लाने में पीछे नहीं है।
20 नवंबर को पटना के गांधी मैदान में होने वाले शपथ ग्रहण कार्यक्रम को लेकर प्रशासन युद्धस्तर पर तैयारी कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति के कारण SPG ने मैदान की सुरक्षा अपने हाथ में ले ली है। आम लोगों के प्रवेश पर रोक है और आसपास के पूरे इलाके में सुरक्षा घेरा बढ़ा दिया गया है। अनुमान है कि 2-3 लाख से ज्यादा लोग मौके पर मौजूद रहेंगे। यह बिहार की सबसे बड़ी राजनीतिक रैलियों जैसी भीड़ होगी, लेकिन बेहद नियंत्रित।
NDA की ऐतिहासिक वापसी: 202 सीटों के साथ सत्ता में, JDU की मजबूती ने बदल दिया समीकरण
इस चुनाव का सबसे बड़ा संदेश यह रहा कि NDA एक बार फिर 200 से अधिक सीटों के साथ सत्ता में लौटा। BJP 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन JDU ने भी 43 से छलांग लगाकर 85 सीटों पर जीत दर्ज की। इस मजबूती के बाद जदयू अब पहले की तुलना में BJP से अधिक हिस्सेदारी मांग रहा है, जो विवाद को जन्म दे रही है। इसके साथ LJP(R), HAM और RLN ने भी अपनी उपस्थिति को इतनी मजबूती से दर्ज कराया है कि उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
कुल मिलाकर, बिहार में सत्ता संतुलन की सबसे बड़ी परीक्षा स्पीकर की कुर्सी पर अटकी है। 20 नवंबर से पहले दोनों पार्टियों को किसी न किसी बिंदु पर झुकना ही होगा। फिलहाल दिल्ली में बैठकों का दौर जारी है, और पटना में जनता सांस रोककर देख रही है कि अगली सुबह बिहार की नई राजनीति किस आकार में सामने आएगी
