बिहार में मंगलवार की मध्यरात्रि से थर्मोकोल के साथ एक उपयोग प्लास्टिक पर पूरी तरह प्रतिबंध लग गया। इसके विनर्माण, आयात, भंडारण, परिवहन, वितरण, विक्रय एवं उपयोग अब दंडनीय अपराध की श्रेणी में आ चुका है। लोग अब इसकी खरीद-बिक्री नहीं कर सकेंगे। यदि किसी ने इसका उपयोग किया तो उसे एक लाख रुपए का जुर्माना और पांच साल तक की सजा हो सकती है।
यानि प्लास्टिक कप, प्लेट, ग्लास, कटोरी, कांटा, चम्मच, स्ट्रॉ, घोटन, थर्मोकोल के कप, प्लेट, ग्लास, कटोरी, प्लास्टिक बैनर एवं ध्वज-पट्ट, प्लास्टिक झंडा, झाड़-फानूस एवं सजावट की सामाग्री, प्लास्टिक परत वाले कागज के प्लेट, कप, पानी के पाउच एवं पैकेट्स जैसा समाग्री बाजार में देखने को नहीं मिलेगी।
अभी तक बाजार पर 85 प्रतिशत प्लास्टिक व थर्मोकोल की थाली का कब्जा था। सिंगल यूज प्लास्टिक और थर्मोकोल पर रोक के बाद अब लोगों के पास भोज में पत्ते, पेपर व बायोडिग्रेबल थाली के विकल्प हैं। इस क्षेत्र में अब रोजगार बढ़ने की संभावना भी बन गई है। मतलब लगभग डेढ़ दशक बाद फिर से पत्ते की थाली व कटोरी का जमाना लौटने की आशा है।
पहले पत्ते की थाली व कटोरी ही ज्यादा बिकती थी लेकिन कम कीमत के कारण प्लास्टिक व थर्मोकोल की थाली बाजार पर हावी हो गई। सबसे बड़ी बात यह थी इसमें किसी तरह का परेशानी नहीं होती थी। जबकि पत्ते की थाली व कटोरी में छेद निकल जाता था। साथ ही पत्ते की थाली की कीमत डेढ़ से दो रुपये, कटोरी 70 से 75 पैसा जबकि थर्मोकोल की थाली एक रुपये व कटोरी 30 से 35 पैसा पड़ता है। इस कारण आधी कीमत में उन्हें यह उपलब्ध हो जाता था।
अब सरकार के नए आदेश के बाद पेपर व बायोडिग्रेवल का कारोबार भी बढ़ेगा। सरकार के नये आदेश के बाद बांका, जमुई, मुंगेर में कई कुटीर उद्योग खुल जायेंगे। जिसमें दस हजार से अधिक लोग पत्ता तोड़ने, इसे बनाने में जुटकर रोजगार पा सकते हैं। इस क्षेत्र में जंगल होने के कारण इस उद्योग में अपार संभावना है।
राज्य में केला का उत्पादन काफी होता है। अभी तक इसके पत्ते को फेंक दिया जाता है। जबकि दक्षिण भारत में केले की थाली, प्लेट के उपयोग का प्रचलन अधिक है। बिहार सरकार को इसे उपयोग में लाना चाहिए। इससे युवाओं को रोजगार भी मिलेगा और केले के पत्ते को इधर-उधर फेंकना नहीं पड़ेगा। हिंदू शास्त्रों में केले के पत्ते में खाने को शुद्ध माना जाता है।
