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सबसे पहले आप सभी को 75वी स्वंतंत्रता दिवस की हार्दिक शुबकामनाये। आज 15 अगस्त के साथ ‘हमारे सात दिन के 7 अनजान और गुमनाम रत्न’ की श्रेणी भी ख़तम हो रही है। और आज के अंतिम लेख में हमारे प्रदेश बिहार के सबसे पुराने और कट्टर क्रांतिकारियों में से एक यमुना करजी की कहानी पेश है।

~ यमुना कारजी – “नॉन कोपरशन मूवमेंट अर्थात असहयोग आंदोलन”

यमुना करजी एक स्वतंत्रता सेनानी, एक स्वतंत्रता कार्यकर्ता और भारत के महान देशभक्तो में से एक थें। जिन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में उत्साहपूर्वक भाग लिया और अपनी ज़िम्मेदारी भी निभाई। करजी का जन्म 1898 में बिहार के पूसा के पास देवपर के छोटे से एक गाँव में हुआ था। उनके पिता अनु करजी एक किसान थे, जिनकी मृत्यु तब ही हो गई थी जब यमुना कारजी केवल 6 महीने के थे। कररजी अपने स्कूल के आख़िरी दिनों में भारतीय स्वतंत्रता के संघर्ष के कारण आकर्षित हुए थे। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रेसीडेंसी से कानून की डिग्री प्राप्त की।

पढ़ाई पूरी करने के बाद यमुना कारजी को सरकार में कई नौकरियों का प्रस्ताव मिला। लेकिन करजी ने हमेशा सरकार की ओर से आए सभी प्रस्तावों को ठुकरा था। और फिर वह सीधे एक उल्लेखनीय हिंदी पत्रकार बन गए। जिसके बाद वह भारत मित्र के संपादकीय प्रभाग में भी शामिल हुए। भारत मित्र कलकत्ता में प्रकाशित एक हिंदी साप्ताहिक था। चूँकि वह पत्रकार थे तो उन्हें खबरों का ज्ञान था इसलिए उन्होंने सं 1920 से 1921 तक, महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग भी लिया।

लेकिन आपको बता दें की पत्रकारिता ही एक मात्रा कारण नहीं था उनके अंग्रेज़ो के खिलाफ असहयोग आंदोलन में शामिल होने का। चूँकि वह किसान आंदोलन की शुरुआत करने वाले ”स्वामी सहजानंद सरस्वती के नेतृत्व से भी बेहद प्रेरित थे, वहीं वह खुद भी एक कट्टर देशभक्त थे। और यही सब कारण मिलके उन्हें विभिन्न भारतीय स्वतंत्रता गतिविधियों में भाग लेने प्रेरणा देता था। स्वतंत्रता गतिविधियों में उनकी सक्रिय भागीदारी के लिए उन्हें कई बार जेल की सजा भी सुनाई गई है। उनका मुख्य उद्देश्य भारत में ब्रिटिश शासन के खिलाफ लड़ना एवं अंग्रेज़ो को पूर्ण रूप से देश से बहार निकलना था।

यमुना कारजी की मृत्यु देश आज़ाद होने के 6 साल बाद ही यानि की 1953 में हो गया था। करजी एक उल्लेखनीय हिंदी पत्रकार के रूप में अपने जन्म स्थल पर अभी भी जाने जाते है। बिहार के मुझफ्फरपुर जिले में उनके नाम से एक यूनिवर्सिटी भी बानी थी और वहां आज भी बच्चे पढ़ते है।

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