हर चुनाव में सौहार्द , समावेश और प्रतिनिधित्व की बातें की जाती हैं, लेकिन जब टिकट बंटते हैं, तो मुस्लिम समाज का नाम तक नहीं लिया जाता।
महागठबंधन की ओर से तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री और मुकेश सहनी को डिप्टी CM फेस घोषित करने के बाद, यह बहस और गहरी हो गई है।

चिराग पासवान का बयान — “बात करते हैं, लेकिन देते कुछ नहीं!”

केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने तीखा हमला करते हुए कहा कि “महागठबंधन मुसलमानों के नाम पर राजनीति करता है, लेकिन जब प्रतिनिधित्व देने की बात आती है, तो उन्हें कुछ नहीं दिया जाता। उन्हें सिर्फ वोट बैंक बनाकर रखना है।”
चिराग ने बात आगे बढ़ाते हुए कहा कि “मुकेश सहनी को डिप्टी CM चेहरा बना दिया, लेकिन क्या उनके समाज के लोगों को टिकट मिला? जो लोग प्रचार तक में नहीं निकलते, वो बिहारियों की तकलीफ कैसे समझेंगे?”
उन्होंने सीधा सवाल खड़ा करते हुए कहा “क्या मुसलमान सिर्फ वोट देने के लिए हैं, प्रतिनिधित्व के लिए नहीं?”

मनोज तिवारी का तंज — “मुस्लिम समाज को सिर्फ वोट बैंक समझती है महागठबंधन”

पटना पहुंचे बीजेपी सांसद मनोज तिवारी ने कहा “महागठबंधन को मुस्लिम समाज से सिर्फ वोट चाहिए, विकास नहीं देना। अगर किसी ने मुस्लिम समाज के लिए कुछ किया है, तो वो एनडीए ने किया है —
मोदी जी और नीतीश जी ने।” उन्होंने यह भी सवाल उठाते हुए कहा कि “तेजस्वी यादव को CM फेस घोषित करने में इतनी मशक्कत क्यों करनी पड़ी? क्योंकि महागठबंधन के भीतर सबको सिर्फ कुर्सी चाहिए, समाज नहीं।”

शाहनवाज हुसैन बोले — “डर दिखाकर वोट लेंगे, सम्मान नहीं देंगे”

भाजपा प्रवक्ता सैयद शाहनवाज हुसैन ने कहा “महागठबंधन के नेताओं ने यह तय कर लिया है कि वे मुस्लिम समाज को डराकर वोट लेंगे। टिकट वितरण में मुस्लिम उम्मीदवारों की अनदेखी की गई।
मंच पर सिर्फ भाषण हैं, ज़मीन पर प्रतिनिधित्व नहीं।” उन्होंने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा कि एनडीए “सबका साथ, सबका विश्वास” की राह पर है। हम वोट नहीं, विश्वास जीतना चाहते हैं।”

प्रमुख / मुख्य सवाल यह है कि क्या बिहार की राजनीति में मुसलमानों की भूमिका सिर्फ वोट डालने तक सीमित रह गई है और क्या उनके नाम पर गठबंधन बनते रहेंगे, लेकिन टिकट और सत्ता से वे दूर रहेंगे?
बिहार की सियासत में मुसलमानों की भूमिका आज भी सवालों के घेरे में है जहां मंच पर उनके नाम से तालियां बजती हैं, मगर सत्ता की कुर्सी पर उनकी जगह अब भी खाली है।