बिहपुर और गोपालपुर में प्रशांत किशोर ने जनता से किया संवाद, बोले—‘राजनीति जनता के साथ, जनता के लिए होनी चाहिए।’बिहार की राजनीति में ‘जन सुराज’ का नाम अब किसी परिचय का मोहताज नहीं। बुधवार को भागलपुर जिले में जन सुराज अभियान के सूत्रधार प्रशांत किशोर (पीके) ने एक बार फिर अपने संवाद की राजनीति को आगे बढ़ाया। उन्होंने गोपालपुर और बिहपुर में दो जनसभाओं के ज़रिए जनता से सीधा संवाद किया, सवाल सुने, जवाब दिए और साथ ही अपनी पार्टी प्रत्याशियों के लिए समर्थन मांगा।

मिलन चौक से उठी आवाज़: राजनीति को जनता तक लौटाना होगा

पहली सभा गोपालपुर विधानसभा क्षेत्र के नवगछिया के मिलन चौक पर आयोजित की गई, जहाँ भीड़ में युवाओं, महिलाओं और किसानों की मौजूदगी ने यह संकेत दिया कि लोग अब विकल्पों की तलाश में हैं। प्रशांत किशोर ने मंच से कहा “बिहार में सत्ता की राजनीति से पहले समाज की राजनीति जरूरी है। जब तक जनता अपने हक़ की बात खुद नहीं करेगी, तब तक बदलाव अधूरा रहेगा।”

उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे मुद्दों को केंद्र में रखते हुए पूछा “क्या आज़ादी के 75 साल बाद भी बिहार को वही समस्याएं नहीं झेलनी पड़ रहीं जिनसे हमारे दादा-दादी जूझते थे?”यह सवाल सभा में मौजूद हर व्यक्ति के मन में गूंजता रहा।

बिहपुर में संवाद: जन सुराज या जन क्रांति?

दूसरा कार्यक्रम बिहपुर के वशिष्ठ पेट्रोल पंप (BPCL परिसर) में हुआ। यहाँ पीके ने न केवल अपनी राजनीतिक रणनीति साझा की, बल्कि यह भी स्पष्ट किया कि “जन सुराज कोई पार्टी नहीं, बल्कि एक आंदोलन है”हमारी सोच ‘लोगों के द्वारा, लोगों के लिए और लोगों के साथ’ की है। यह आंदोलन सिर्फ वोट मांगने का नहीं, सोच बदलने का प्रयास है।”स्थानीय नागरिकों ने भी अपने मुद्दे रखे ,कहीं रोजगार की कमी, कहीं स्कूलों की दुर्दशा, तो कहीं सरकारी योजनाओं की धीमी रफ्तार पर नाराज़गी जाहिर की।

बिहार की राजनीति पर सवाल: क्या विकल्प तैयार है?

प्रशांत किशोर की जनसभाएं लोगों में उम्मीद जगाती हैं, लेकिन एक बड़ा सवाल भी छोड़ जाती हैं “क्या यह ‘वैकल्पिक सोच’ वाकई सत्ता तक पहुंचेगी?” राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जन सुराज ने ग्रामीण राजनीति में संवाद की नई संस्कृति पैदा की है, लेकिन अभी यह देखना बाकी है कि क्या यह संवाद ठोस जनसमर्थन में बदल पाता है।जन सुराज के PRO कृष्ण के अनुसा “पीके का लक्ष्य केवल चुनावी जीत नहीं, बल्कि बिहार में जन-भागीदारी पर आधारित राजनीति की नई परिभाषा गढ़ना है।”

तैयारियां, सुरक्षा और उम्मीदों का माहौल

दोनों सभाओं में भारी भीड़ रही। प्रशासन ने सुरक्षा के पुख़्ता इंतज़ाम किए थे। स्थानीय स्तर पर लोगों में चर्चा रही कि पीके के भाषणों में एक योजनाकार की रणनीति और एक सामाजिक सुधारक की संवेदना दोनों झलकती हैं।

क्या बिहार का राजनीतिक मिजाज बदल रहा है?

प्रशांत किशोर की यह यात्रा केवल वोट मांगने का सिलसिला नहीं, बल्कि बिहार के भविष्य को लेकर एक विमर्श है। उनकी जनसभाओं से यह सवाल उठता है कि “क्या जनता अब वही पुरानी राजनीति चाहती है, या बदलाव की नई पटकथा लिखने को तैयार है?”भागलपुर की इन जनसभाओं ने यह संकेत तो दे ही दिया है कि बिहार की धरती पर ‘जन सुराज’ अब केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक विचार-यात्रा बन चुकी है।