मौसम के आगे झुकी राजनीति
दरभंगा के कुशेश्वरस्थान में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की प्रस्तावित जनसभा अचानक रद्द कर दी गई। खराब मौसम ने राजनीतिक माहौल को भी भिगो दिया। मुख्यमंत्री का यह कार्यक्रम केवटगामा पंचायत के दिघिया पार मैदान में होना था, जहां एनडीए समर्थित जदयू प्रत्याशी अतिरेक कुमार के समर्थन में वह जनता को संबोधित करने वाले थे। राजनीति का यह मंच मौसम के आगे झुकते ही उम्मीदों की सभा स्थगित हो गई।
पूरी थी तैयारी, लेकिन मौसम ने बिगाड़ा खेल
युवा जदयू के प्रदेश महासचिव गौरव कुमार राय ने बताया कि मुख्यमंत्री के साथ जदयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा भी आने वाले थे। मंच से लेकर माइक तक, हर तैयारी पूरी थी। रातभर मेहनत से पंडाल और हेलीपैड बनाए गए थे। लेकिन सुबह की बूंदाबांदी ने सारे गणित बिगाड़ दिए। यह रद्दीकरण बताता है कि राजनीति कितनी सशक्त हो जाए, प्रकृति की शक्ति फिर भी सर्वोपरि रहती है।
बारिश ने रोकी रफ्तार, थमी उम्मीदें
पिछले दो दिनों से मॉनथा चक्रवात के प्रभाव में आसमान घने बादलों से घिरा है। हवा में नमी और ज़मीन पर कीचड़ ने जनसभा को नामुमकिन बना दिया है। प्रशासन पहले ही चेतावनी दे चुका था कि अगर मौसम ने साथ न दिया, तो कार्यक्रम मुश्किल हो सकता है। मौसम का यह बदलाव सिर्फ सभा नहीं रोक पाया, बल्कि उम्मीदों की रफ्तार भी थाम दी।
जनता कर रही थी इंतज़ार, लेकिन खाली रह गया मंच
स्थानीय लोग सुबह से ही मुख्यमंत्री के इंतज़ार में मैदान में जुटने लगे थे। पंडाल के नीचे खाली कुर्सियाँ, झुकी तिरपालें और गीली ज़मीन ने इस बात की गवाही दी कि राजनीति के मंच पर भी कभी-कभी मौन सबसे बड़ा भाषण होता है।जनता का यह इंतज़ार दिखाता है कि राजनीति अब मौसम नहीं, मनोभावों से भी खेलती है।
अतिरेक के लिए नई चुनौती
हालांकि सभा स्थगित हुई, लेकिन जदयू प्रत्याशी अतिरेक कुमार के लिए यह झटका एक नई परीक्षा बनकर आया है। चुनावी रणनीति अब बदलनी होगी। जनता तक संदेश पहुँचाने का नया तरीका खोजा जाएगा, क्योंकि इस बार बारिश ने सिर्फ मैदान नहीं, प्रचार की रफ्तार भी रोक दी है। मौसम ने भले सभा रोक दी हो, पर राजनीतिक जंग जारी है र असली परीक्षा अब जनता के हाथों में है।
सियासत पर छाया मौसम का साया
दरभंगा की यह घटना याद दिलाती है कि राजनीति चाहे जितनी संगठित क्यों न हो, प्रकृति का संतुलन हर योजना से बड़ा है। नीतीश कुमार की अनुपस्थिति ने जनता के बीच सवाल छोड़े हैं कि यह एक साधारण रद्दीकरण था, या संकेत है बिहार की सियासत में हवापलट का। राजनीति के इस मौसम में बादल सिर्फ बरसे नहीं ,उन्होंने सोचने पर भी मजबूर कर दिया कि कौन सचमुच जनता के साथ है और कौन सिर्फ मंच के नीचे तिरपाल तलाश रहा है।
