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बिहार में ज़मीनी विवादों को सुलझाने के क्रम में राज्य सरकार ने एक बार फिर कदम उठाया है। जिसके तहत आईआईटी रूड़की की टीम को ख़ास करके राज्य में भूमि सर्वेक्षण करने के लिए बुलाया गया था। जिसके बाद से किसानों की खेत – जमीनो को एक जगह करने का काम राज्य सरकार एक बार फिर शुरू करेगी। अर्थार्त बिहार में एक बार फिर शुरू होगी चकबंदी कानून।

यह बात से सभी वाखिफ़ होंगे की भूमि विवाद का मामला हमारे प्रदेश की सबसे जटिल समस्या है। बिहार सरकार की इस पहल से जहां एक तरफ किसानों को फायदा होगा तो वहीं दूसरी ओर जमीन से जुड़े विवाद में भी काफ़ी कमी आने की उम्मीद लगाई जा रही है। बहुत जल्द चकबंदी कर किसानो की अलग-अलग जगह स्थित खेती करने वाली ज़मींन को एक जगह करवाने और उनके प्लॉट उन्हें वापस उपलब्ध कराने का काम प्रारंभ किया जाएगा। बताया जा रहा है कि सरकार की इस कानून को दुबारा शुरू करने का मकसद इस बार, ज़मीनी विवाद को जड़ से खत्म करने को लेकर है।

क्या है चकबंदी कानून ?
बिहार में चकबंदी कानून साल 1956 में शुरू हुआ था, लेकिन इस कानू का प्रयोग साल 1970 से होना शुरु हुआ था। चकबंदी के अंतर्गत, एक किसान के पास यदि दस अलग-अलग जगहों पर जमीन के छोटे-छोटे टुकड़े हैं, तो उसको एक स्थान पर लाकर उस किसान को चक के तौर पर दे दिया जाता है। इसमें सबसे बड़ी बात यह है उसमें कॉमर्शियल और भाव देखा जाता है और साथ ही साथ प्रत्येक जमीन पर जाने के लिए सड़क पानी का प्रबंध रहता है। यानि आप ट्रैक्टर से सीधे किसी भी प्लॉट पर जा सकते हैं। पूरा काम इलेक्ट्रॉनिक तकनीकी तरीके से हो रहा है, ताकि कही कुछ गलत ना हो।

जानकारी के अनुसार, साल 1992 के समय इस कानून पर रोक लगा दी गई थी। राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के मंत्री रामसूरत का कहना है कि “सीएम नीतीश कुमार के द्वारा इसकी पहल सात वर्ष पूर्व ही की गई थी, मगर परिणाम अब जाकर मिला है। अब जब यह पहल अपनी परिणीति पर पहुंचा है, तो आने वाले दिनों में इसका लाभ भी राज्य के किसानो को ज़रुर मिलनी चाहिए।” भूमि सुधर मंत्री का यह भी कहना है कि इस पहल के बाद ना केवल जमीनी विवाद खत्म होगी, बल्कि किसान चाहे तो अपनी जमीन को किराय पर भी दे सकेंगे। इसके अलावा वह अपनी जमीन को आसानी से बेच भी सकेंगे।

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