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कोरोना काल में बिहार के दोनों ग्रामीण बैंक बेहाल हैं। हालांकि देश के 43 में से 19 ग्रामीण बैंकों का हाल कुछ ऐसा ही है। उत्तर बिहार ग्रामीण बैंक हो या दक्षिण बिहार ग्रामीण बैंक, दोनों ही घाटे में चल रहे हैं। हालात यह हैं कि बिहार के यह दोनों ग्रामीण बैंक सीआरएआर (पूंजी पर्याप्तता अनुपात) मानक नौ प्रतिशत भी बरकरार नहीं रख पा रहे हैं। इन बैंकों की राज्य के ग्रामीण क्षेत्र में 2110 शाखाएं हैं। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने को स्थापित इन बैंकों को कोविड-19 आपदा के दौर में खुद ऑक्सीजन की जरूरत है।

असल में क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की स्थापना नरसिंह्म समिति की सिफारिश पर केंद्र सरकार ने 26 सितंबर 1975 को की थी। क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक अधिनियम 1976 के जरिए इसे संवैधानिक मान्यता मिली। इनका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि और व्यापारिक गतिविधियों के विकास में किसानों, श्रमिकों और छोटे उद्यमियों को सहयोग करना था। इन ग्रामीण बैंकों का संचालन केंद्र सरकार राज्य सरकार और प्रायोजक बैंकों की मदद से करती है। मसलन उत्तर बिहार ग्रामीण बैंक का प्रायोजक बैंक सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया और दक्षिण बिहार ग्रामीण बैंक का पंजाब नेशनल बैंक है। इन दोनों बैंकों की वित्तीय स्थिति पर नजर डालें तो दक्षिण बिहार बैंक 22020.28 लाख और उत्तर बिहार ग्रामीण बैंक 40945.40 लाख के घाटे में है।

सीआरएआर मानक भी पूरे नहीं कर पा रहे

राज्य के दोनों ग्रामीण बैंक 09 प्रतिशत का सीआरएआर यानी पूंजी पर्याप्तता अनुपात भी पूरा नहीं कर पा रहे। असल में यह बैंक की पूंजी को मापने का एक तरीका है। यह वास्तव में बैंक की जोखिम वाली पूंजी का प्रतिशत बताता है। इस अनुपात का इस्तेमाल जमाकर्ताओं के धन की सुरक्षा और वित्तीय तंत्र के स्थायित्व के लिए किया जाता है। नौ प्रतिशत की जगह उत्तर बिहार ग्रामीण बैंक का सीआरएआर 2.88 प्रतिशत और दक्षिण बिहार ग्रामीण बैंक का 5.04 फीसदी है। बता दें कि इस वक्त देश के 43 में से 15 ग्रामीण बैंक इस मानक का पालन नहीं कर पा रहे।

इन बैंकों के खस्ताहाल होने के कुछ प्रमुख कारण

इन ग्रामीण बैंकों के खस्ताहाल होने का पहला कारण यह है कि इन्हें अपने प्रायोजक बैंकों से ही प्रतिस्पर्द्धा का सामना करना पड़ता है। यूं तो व्यावसायिक बैंकों की भी ग्रामीण क्षेत्र की शाखाएं घाटे में हैं मगर शहरी शाखाएं उस नुकसान को पूरा कर देती हैं। लेकिन ग्रामीण बैंकों की 90 प्रतिशत शाखाएं गांवों में ही हैं। ग्रामीण बैंकों की शुरुआत तो अल्प लागत बैंक के रूप में हुई थी मगर अब वेतन के साथ ही इसी साल 18 अप्रैल से पेंशन भी व्यवसायिक बैंकों के बराबर हो गई है। ऐसे में स्थापना खर्च तो ग्रामीण बैंकों का बढ़ गया लेकिन आमदनी नहीं बढ़ी। इन बैंकों के पास इतनी अधिक पूंजी भी नहीं है कि बड़े लोन दे सकें। इनकी आमदनी का मुख्य स्रोत लोन है मगर कोरोना काल में लोग पहुंच नहीं रहे। लोन के रूप में दी गई राशि न लौटने से इनकी माली हालत और पतली हो चली है।

प्रायोजक बैंकों में विलय की मांग

देश में ग्रामीण बैंकों की संख्या लगातार घट रही है। वर्ष 2005 में जहां इनकी संख्या 196 थी जो अब 43 रह गई है। वर्ष 2018-19 में जहां 14 ग्रामीण बैंक घाटे में थे, वहीं 2019-20 में यह संख्या बढ़कर 19 हो गई। इसमें उत्तर और दक्षिण बिहार ग्रामीण बैंक भी शामिल हैं। ऐसे में ग्रामीण अर्थतंत्र को मजबूत करने के लिए बैंकिंग क्षेत्र के प्रमुख संगठन एआईबीईए, ऑयबाक और एआईबीओए ने ग्रामीण बैंकों के उनके प्रायोजक व्यावसायिक बैंकों में विलय की मांग की है।