FSSAI बैन के बावजूद ORSL ड्रिंक की बिक्री को मिली राहत। दिल्ली हाईकोर्ट ने जॉनसन एंड जॉनसन की सहायक कंपनी JNTL Consumer Health (India) को राहत देते हुए, FSSAI (भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण) द्वारा लगाए गए बैन के बावजूद ORSL की बिक्री की अनुमति दे दी है। कोर्ट ने कंपनी को लगभग 155 से 180 करोड़ रुपये मूल्य के मौजूदा स्टॉक को बेचने की अंतरिम मंज़ूरी दी है, जबकि को कंपनी की दलील सुनने का निर्देश दिया गया है।
न्यायमूर्ति सचिन दत्ता की एकल पीठ ने 17 अक्टूबर को यह आदेश पारित करते हुए कहा कि FSSAI तब तक अपने आदेश लागू नहीं करेगा जब तक कंपनी की अपील पर विचार नहीं हो जाता। इस फैसले ने एक बार फिर ‘सार्वजनिक स्वास्थ्य बनाम कॉर्पोरेट ताकत ‘ की बहस को नया रूप दे दिया है।
ORS क्या है और विवाद क्यों?
ORS (Oral Rehydration Solution) कोई सामान्य पेय नहीं, बल्कि ‘डायरिया और निर्जलीकरण के इलाज‘ के लिए एक सटीक चिकित्सा फार्मूला है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा तय इसके मिश्रण में सोडियम क्लोराइड, पोटैशियम क्लोराइड, ट्राइसोडियम साइट्रेट और ग्लूकोज़ का संतुलित अनुपात होता है। इसके विपरीत, कई बाजारू पेय जैसे ORSL, Rebalanz, VitORS, ORSfit और Glucon-D Active ORS में शक्कर की मात्रा WHO मानक से 8 से 10 गुना तक ज़्यादा पाई गई है, जबकि इलेक्ट्रोलाइट्स बेहद कम हैं। इससे बच्चों में डिहाइड्रेशन बढ़ने का खतरा और भी अधिक हो जाता है।
NFHS-5 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में डायरिया से पीड़ित बच्चों में केवल 60% को ही सही ORS उपचार मिल पाता है, जबकि डायरिया अब भी पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मौत का तीसरा सबसे बड़ा कारण है। ऐसे में इन उत्पादों की भ्रामक ब्रांडिंग एक गंभीर जनस्वास्थ्य संकट बन सकती है।
कोर्ट का अंतरिम राहत आदेश, कंपनी को मिली छूट — लेकिन सवाल गहराते गए
FSSAI ने 14 अक्टूबर को जारी आदेश में कहा था कि किसी भी पेय पदार्थ पर “ORS” शब्द का प्रयोग करना उपभोक्ताओं को गुमराह करने के बराबर है।
इससे पहले, 2022 में FSSAI ने कंपनियों को “ORS” शब्द का प्रयोग कुछ शर्तों के साथ करने की अनुमति दी थी, लेकिन हाल ही में उस अनुमति को पूरी तरह रद्द कर दिया गया।JNTL ने अपने याचिका में आरोप लगाया कि FSSAI का यह कदम अचानक और असंगत है, जिससे उनके सप्लाई चेन और कारोबार को भारी नुकसान हुआ है।
डॉक्टरों और विशेषज्ञों की चेतावनी
हैदराबाद की डॉ. शिवरंजननी सन्तोष ने पिछले आठ वर्षों से इस मुद्दे पर अभियान चलाया है। उन्होंने कई मामलों का उल्लेख किया जहाँ बच्चे, माता-पिता द्वारा ORS समझकर दिए गए पेय पीने के बाद गंभीर डिहाइड्रेशन की स्थिति में क्लिनिक लाए गए। उन्होंने 2021 में केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) , FSSAI और स्वास्थ्य मंत्रालय को पत्र लिखकर चेताया था। बाद में उन्होंने 2023 में जनहित याचिका भी दायर की। उनका कहना है कि बाजार में बिकने वाले ये ड्रिंक्स असल में मीठे झांसे हैं, जो बच्चों की जान ले सकते हैं।
स्वास्थ्य या बाज़ारीकरण ?
जन स्वास्थ्य अभियान (JSAI) के राष्ट्रीय संयोजक अमूल्य निधि ने कहा कि यह मामला केवल एक कंपनी या उत्पाद तक सीमित नहीं है, बल्कि स्वास्थ्य के व्यापारीकरण की गहरी प्रवृत्ति को दर्शाता है। उनके अनुसार अगर कोई कंपनी कहती है कि उसे 180 करोड़ का नुकसान होगा, तो भी वह जनता के स्वास्थ्य से बड़ा नहीं। उन्होंने FSSAI की निगरानी प्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह वर्षों से नियामक विफलता का उदाहरण है। सरकार ने जनता को यह बताने के लिए अब तक कोई व्यापक जागरूकता अभियान नहीं चलाया कि ये पेय असली ओआरएस नहीं हैं। यह सीधा-सीधा जनता से धोखाधड़ी है।
जनस्वास्थ्य और मुनाफ़े के बीच खड़ा प्रश्न
दिल्ली हाईकोर्ट का यह अंतरिम आदेश फिलहाल कंपनियों को राहत देता है, पर सवाल यह है कि इसका असर जनता के स्वास्थ्य पर कितना भारी पड़ेगा।
भारत जैसे देश में, जहाँ बच्चों की हर तीसरी मौत डायरिया से जुड़ी है, वहां ORS जैसी चिकित्सा शब्दावली का व्यावसायिक दुरुपयोग केवल कानूनी नहीं, नैतिक प्रश्न भी है। अब फैसला अदालतों से आगे जनता के विवेक और सतर्कता पर है। अब यह तय करना हमारा कर्तव्य है — बच्चों की ज़िंदगी और स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी जाएगी, न कि मुनाफ़े के मीठे झूठ को।
