छात्र नेताओं की प्रतिक्रिया: इंसाफ मिला, पर संतोष नहीं
ढाका की इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल में जब फैसला पढ़ा जा रहा था, कोर्टरूम के भीतर और बाहर भावनाओं का सैलाब उमड़ चुका था। 2024 के छात्र आंदोलन का चेहरा बने स्निग्धो फैसले के हर शब्द को जैसे अपने दिल पर दर्ज होते देख रहे थे। उन्होंने अपने भाई मीर महामुबुर रहमान मुग्धो को उस आंदोलन में पुलिस की गोली से खो दिया था। आज भी वो पल उनके मन में वैसा ही ताजा है—खून से सनी सड़कें, भागते छात्र, और एक ऐसी दहशत जिसने कई रातें उनकी नींद छीन लीं। फैसले पर उनका कहना था ‘मैं संतुष्ट नहीं हूं।‘ IGP ममून को सिर्फ 5 साल, जिसने आदेश दिए, जो सब कुछ जानता था, उसे उम्रकैद मिलनी चाहिए थी।’ स्निग्धो की आंखों में मौजूद शिकायत उस पीढ़ी की आवाज़ है जिसने अपने दोस्तों को लिए बिना आंदोलन खत्म नहीं होने दिया।
ट्रिब्यूनल का फैसला: तीन आरोप, एक सजा—सजा-ए-मौत
इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल की स्पेशल बेंच ने घंटों की सुनवाई के बाद कहा ‘शेख हसीना को मानवता के खिलाफ अपराधों का दोषी पाया जाता है। सभी आरोपों में एक ही सजा, फांसी।’ फैसले का यह वाक्य पूरे बांग्लादेश में बिजली की तरह फैल गया। अदालत के बाहर मौजूद लोगों ने एक-दूसरे से यह खबर ऐसे साझा की मानो यह किसी तानाशाही के अंत की घोषणा हो। पूर्व गृह मंत्री असदुज्जमान खान कमाल को भी फांसी की सजा दी गई है। वहीं विवाद का केंद्र बने पूर्व IGP अब्दुल्ला अल-ममून को मिली 5 साल की सजा ने ढाका में नई बहस छेड़ दी है, क्योंकि वही सरकारी गवाह बने थे और उनकी गवाही पर ही फैसले की मजबूत नींव रखी गई।
ढाका यूनिवर्सिटी के छात्र महीन ने फैसला सुनते ही फोन पर कहा ‘हमने बहुत रातें डर में गुजार दीं, छतों पर छिपकर रहना पड़ा, सड़क पर निकलना मौत को बुलाने जैसा था।’
जुलाई-अगस्त 2024 की हिंसा ने बांग्लादेश की युवा पीढ़ी को भीतर तक हिला दिया था। UN की रिपोर्ट में 1400 मौतें दर्ज हैं, लेकिन महीन का दावा है ‘गिनती इससे कहीं ज्यादा है। हमने खुद लाशें उठाई हैं।’ फैसले पर उनकी आंखों में आए आंसू सिर्फ खुशी के नहीं थे, बल्कि उस संघर्ष की याद थे जिसे उन्होंने अपने दोस्तों को खोकर जीता था।
NCP नेताओं की कड़ी प्रतिक्रिया: ‘कत्लेआम हुआ था, फांसी भी कम है’
NCP के कद्दावर नेता अलाउद्दीन मोहम्मद का कहना है ‘ये फैसला होना तय था लेकिन ये सजा भी कम है। हसीना के आदेश पर हुए कत्लेआम ने युवाओं की एक पीढ़ी को मानसिक रूप से तोड़ दिया।’ वे दावा करते हैं कि कई युवा आज भी उस भयावह हिंसा की याद से नहीं उबर पाए हैं, घरों की दीवारों पर झुलसते धुएं के निशान, सड़कों पर गिरी चप्पलें, और टूटे बैरकेड सब उस रात के गवाह हैं। वे भारत की ओर इशारा करते हुए कहते हैं ‘भारत हमारे दिल का दोस्त है, सरकारों का नहीं। हसीना को भारत में रखना न्याय के खिलाफ है। उन्हें बांग्लादेश को सौंपा जाना चाहिए।’
बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने यह बयान जारी करके भारत के सामने साफ संदेश रखा ‘इन लोगों को शरण देना न्याय का अपमान होगा। भारत इन्हें तुरंत हमारे हवाले करे।’
अंतरिम प्रधानमंत्री मोहम्मद यूनुस पहले ही भारत सरकार से चर्चा की मांग कर चुके हैं। भारत ने इस पर एक संतुलित बयान दिया ‘हम बांग्लादेश की जनता के हितों के लिए प्रतिबद्ध हैं।’ JGU की प्रोफेसर श्रीराधा दत्ता का स्पष्ट मानना है कि हालात चाहे जैसे हों, भारत हसीना को ना सौंपेगा, ना मजबूर करेगा। उनका कहना है UN दबाव डाले तो भारत संभाल लेगा। पर अगर अमेरिका ने दबाव बनाया तो स्थिति जटिल हो सकती है। उनकी एक और बात महत्वपूर्ण है हसीना चाहें तो खुद लौट सकती हैं, पर भारत उन्हें मजबूर नहीं करेगा यानी गेंद फिलहाल हसीना के पाले में ही है, भारत के नहीं।
हिंदू समुदाय की चिंता: ‘ये बदले की कार्रवाई है, पाकिस्तान की छाया दिखती है’
बांग्लादेश जातीय हिंदू महाजोत के नेता प्रदीप चंद्र पाल का आरोप है कि यह फैसला बदले की आग में दिया गया है। ट्रायल पहले से स्क्रिप्टेड था और पाकिस्तान का प्रभाव साफ दिखता है। वे हसीना के शासन को भी कठघरे में रखते हैं, पर मानते हैं कि मौजूदा हालात में हिंदुओं के लिए खतरा बढ़ सकता है।
उनका कहना है ‘अवामी लीग अभी भी अंडरग्राउंड है, लेकिन हिंसा नहीं करेगी। अभी हालात बेहद संवेदनशील हैं।’
शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग ने बांग्लादेश बंद की घोषणा की है और बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन की तैयारी की है। अवामी लीग नेता सुजीत रॉय नंदी कहते हैं ‘ये फैसला राजनीतिक साजिश है। लक्ष्य साफ है, हसीना की वापसी रोकना।’ स्वयं शेख हसीना ने भारत से जारी अपने बयान में कहा ‘मेरा ट्रायल पक्षपातपूर्ण था। गैर-निर्वाचित सरकार ने राजनीतिक कारणों से मुझे फंसाया है।’ उनकी कैबिनेट के पूर्व सूचना मंत्री अराफात का दावा तो और भी कड़ा है। फैसला पहले लिख दिया गया था, ICT में हम जो कुछ देख रहे थे, वो सिर्फ एक नाटक था।
भारत के लिए संकट: ढाका में बुलडोजर तैयार, माहौल नाजुक
शेख हसीना पिछले 15 महीनों से दिल्ली के एक सेफ हाउस में हैं। भारत की पूर्व हाई कमिश्नर रिवा गांगुली दास का कहना है कि फैसला आते ही धानमंडी इलाके में बुलडोजर पहुंचा दिए गए थे, यह साफ संकेत है कि ढाका में तनाव किसी भी वक्त उबाल ले सकता है। भारत को अभी सावधानी बरतनी होगी। हालात इतने नाजुक हैं कि एक कदम पूरे क्षेत्र की स्थिरता हिला सकता है। ढाका की गलियों में बढ़ी सुरक्षा, इंटरनेट ब्लैकआउट की आशंका और लगातार फैलते प्रदर्शन, ये सब संकेत देते हैं कि मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि क्षेत्रीय राजनीति का बड़ा संकट बन चुका है।
