इस्लामाबाद में आयोजित प्रेस ब्रीफिंग में पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने जिस स्पष्टता और दृढ़ता के साथ चीन के अरुणाचल दावे का समर्थन किया वह दक्षिण एशिया की कूटनीति में एक नया तनाव लेकर आया। अंद्राबी ने कहा कि पाकिस्तान संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के मामलों में चीन के साथ खड़ा है और यह बयान सिर्फ दोस्ती की औपचारिकता नहीं बल्कि एक रणनीतिक संकेत है कि पाकिस्तान भारत के हर संवेदनशील भू-राजनीतिक मुद्दे पर चीन से कदम मिलाकर चलेगा। पाकिस्तान के इस बयान ने यह भी दिखा दिया कि वह अरुणाचल विवाद को अब केवल बाहरी मुद्दा नहीं बल्कि भारत पर दबाव बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक बड़ा कूटनीतिक हथियार मान चुका है। इस बयान ने पूरे क्षेत्र में कूटनीतिक उथल-पुथल को और तेज कर दिया क्योंकि पाकिस्तान की यह घोषणा चीन की ओर झुकाव को औपचारिक रूप से प्रमाणित करती है।

चीन का दावा फिर उभरा और अंतरराष्ट्रीय मंच गरमाया

चीन की विदेश मंत्रालय प्रवक्ता माओ निंग ने एक बार फिर अपने विवादित बयान में कहा कि अरुणाचल प्रदेश जिसे चीन जांगनान कहता है सदियों से चीन का हिस्सा रहा है और भारत का प्रशासकीय नियंत्रण कृत्रिम है। यह बयान उस समय आया जब भारतीय नागरिक पेम वांगजॉम थांगडॉक के साथ शंघाई एयरपोर्ट पर बदसलूकी का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में था। चीन ने इस घटना को गंभीरता से लेने के बजाय इसे एक अवसर के रूप में इस्तेमाल किया और दुनिया के सामने एक बार फिर अपना दावा दोहराया। इससे साफ दिखा कि चीन किसी भी घटना चाहे वह कितनी भी संवेदनशील क्यों न हो उसे अरुणाचल मुद्दे के केंद्र में खींच लाता है ताकि दुनिया के सामने अपने ऐतिहासिक दावे का भ्रम बना सके। माओ निंग का यह बयान चीन की उस रणनीति को उजागर करता है जिसमें वह इतिहास को अपने अनुसार तोड़-मरोड़कर भविष्य को प्रभावित करने की कोशिश करता है।

भारत की सख्त चेतावनी और कड़ा प्रतिवाद

भारत ने चीन और पाकिस्तान दोनों को कड़े स्वर में संदेश दिया कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न, अविभाज्य और संवैधानिक रूप से स्थायी हिस्सा है तथा कोई भी राजनीतिक या कूटनीतिक बयान इस सच्चाई को बदल नहीं सकता। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि चीन के दावे न केवल तथ्यात्मक रूप से गलत हैं बल्कि भारत की संप्रभुता के खिलाफ गंभीर आह्वान भी हैं। उन्होंने पेम वांगजॉम के साथ हुए व्यवहार को मानवाधिकारों का उल्लंघन और भारत के नागरिकों की पहचान पर सीधा हमला बताया। भारत का बयान केवल एक प्रतिक्रिया नहीं बल्कि एक राष्ट्रीय दृढ़ता का प्रदर्शन था जिसने अंतरराष्ट्रीय मंच पर यह स्पष्ट कर दिया कि भारत किसी भी स्थिति में अपने क्षेत्रीय दायरे या नागरिक पहचान से जुड़े मुद्दों पर समझौता नहीं करेगा। यह प्रतिक्रिया भारत की कूटनीति की ताकत और आत्मविश्वास दोनों को दर्शाती है।

चीन की नाम बदल नीति ने बढ़ाया भ्रम और विवाद

चीन पिछले कुछ वर्षों में अरुणाचल प्रदेश के विभिन्न स्थानों के नाम बदलकर एक ऐसी भू-राजनीतिक रणनीति रच रहा है जिसे वह इतिहास का पुनर्निर्माण बताता है। चाइनीज एकेडमी ऑफ सोशल साइंस के शोधकर्ता झांग योंगपान ने यह तर्क दिया कि जिन नामों को चीन ने बदला है वे पुराने तिब्बती-चीनी इतिहास का हिस्सा हैं और भारतीय शासन के बाद उन्हें कृत्रिम रूप से बदला गया था। यह दावा चीन की उसी विस्तारवादी मानसिकता को प्रतिबिंबित करता है जिसमें वह नाम बदलने को एक उपकरण बनाकर दुनिया के सामने यह भ्रम पैदा करता है कि जिन क्षेत्रों पर वह दावा करता है वे उसकी ऐतिहासिक विरासत से जुड़े हैं। अरुणाचल में स्थानों के नाम बदलकर चीन यह सिद्ध करना चाहता है कि इतिहास उसके पक्ष में था जबकि वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत है। यह रणनीति अंतरराष्ट्रीय मंच पर विवाद और तनाव को और अधिक गहरा कर रही है।

चीनी अधिकारियों ने पासपोर्ट को अवैध बताया और 18 घंटे तक हिरासत में रखा

अरुणाचल की मूल निवासी भारतीय नागरिक पेम वांगजॉम के साथ शंघाई एयरपोर्ट पर हुआ व्यवहार न केवल अपमानजनक था बल्कि यह घटना चीन के वास्तविक इरादों को खुलकर सामने लाने वाला बड़ा संकेत भी बनी। पेम ने बताया कि अधिकारियों ने उनके भारतीय पासपोर्ट को मान्यता देने से इनकार कर दिया और कहा कि अरुणाचल प्रदेश चीन का हिस्सा है इसलिए उन्हें चीनी पासपोर्ट लेने की सलाह दी गई। इस आधार पर उन्हें 18 घंटे तक पूछताछ में रखा गया और कई बार ऐसे प्रश्न पूछे गए जिनका उद्देश्य उन्हें मानसिक रूप से तोड़ना था। यह घटना किसी व्यक्तिगत यात्री की परेशानी भर नहीं थी बल्कि भारत की संप्रभुता और नागरिक अधिकारों पर चीन की प्रत्यक्ष चुनौती थी। भारत ने इस घटना को गंभीर कूटनीतिक उल्लंघन बताते हुए इसका सख्ती से विरोध किया और चीन के दावों को आधारहीन करार दिया।


तवांग भारत की सुरक्षा, संस्कृति और भू-राजनीति का केंद्र बिंदु

अरुणाचल प्रदेश भारत के पूर्वोत्तर का सबसे बड़ी सामरिक दीवार है जो तिब्बत, भूटान और म्यांमार से जुड़ा हुआ है। यह क्षेत्र भारतीय सेना के लिए ऊंचाई, भूआकृति और निगरानी के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। इसी कारण चीन का असली ध्यान तवांग पर होता है जो न केवल सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि भारत की सीमा सुरक्षा की रीढ़ भी माना जाता है। तवांग में मौजूद ऊंची चोटियां, सैन्य चौकियां और धार्मिक केंद्र चीन की उस भू-राजनीतिक निर्माण रणनीति के खिलाफ मजबूती से खड़े हैं जिसे वह पूरे हिमालयी क्षेत्र में आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहा है। चीन जानता है कि तवांग पर नियंत्रण भारत की सुरक्षा प्रणाली को गहराई से प्रभावित कर सकता है और इसी वजह से वह अरुणाचल के पूरे क्षेत्र पर दावा जताकर धीरे धीरे तवांग की ओर बढ़ना चाहता है। भारत इसे अपना अस्तित्वगत खतरा मानता है जिसे किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जाएगा।

चीन की नाम बदल नीति अब एक नियमित अभ्यास बन चुकी है और इसका उद्देश्य अरुणाचल प्रदेश पर अपने फर्जी दावे को वैश्विक स्तर पर वैधता दिलाना है। मई 2024 में चीन ने 27 नए स्थानों के नाम जारी किए जिनमें नदियां, पहाड़, कस्बे, बसेरे और पास शामिल थे। इससे पहले भी चीन लगभग 90 स्थानों के नाम बदल चुका है ताकि समय के साथ यह भ्रम पैदा किया जा सके कि ये क्षेत्र उसकी ऐतिहासिक विरासत का हिस्सा हैं। भारत ने हर बार स्पष्ट कहा है कि नाम बदलने से न तो भूगोल बदलता है और न ही इतिहास। अरुणाचल प्रदेश भारत का था है और हमेशा भारत का ही रहेगा और चीन का यह कदम न केवल बचकाना है बल्कि बिल्कुल निरर्थक भी है क्योंकि इससे अंतरराष्ट्रीय मान्यता में कोई बदलाव नहीं आता। भारत ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि ऐसी गतिविधियों से क्षेत्रीय स्थिरता ही बिगड़ेगी।