बांग्लादेश के इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल ने सोमवार को ऐसा फैसला सुनाया जिसने न सिर्फ देश की राजनीति, बल्कि उसके भविष्य की सुरक्षा और स्थिरता को भी प्रभावित कर दिया। यह फैसला पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना, पूर्व गृह मंत्री असदुज्जमान खान कमाल, और पूर्व पुलिस महानिरीक्षक चौधरी अब्दुल्ला अल-मामुन को 2024 के राष्ट्रीय छात्र आंदोलन के दौरान हुए मानवता के विरुद्ध अपराधों में दोषी ठहराता है। यह वही आंदोलन था जिसने वर्षों तक सत्ता में रहीं हसीना सरकार को गिरने पर मजबूर कर दिया था। अदालत के विस्तृत फैसले में कहा गया कि राज्य तंत्र का दुरुपयोग करते हुए छात्र प्रदर्शनकारियों पर बर्बर दमन किया गया, जिसके लिए शीर्ष नेतृत्व सीधे ज़िम्मेदार पाया गया।

फैसले के दिन ढाका में किले जैसी सुरक्षा, अदालत परिसर में दहशत का माहौल

फैसला पढ़े जाने के कुछ घंटे पहले से ही ढाका में अभूतपूर्व सुरक्षा व्यवस्था देखने को मिली। अंतरिम सरकार के प्रमुख नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस के आदेश पर राजधानी और नज़दीकी जिलों में सुरक्षा चौकसी बढ़ाई गई थी। अदालत परिसर को मानो लाल क़िले की तरह घेर लिया गया—सशस्त्र रैपिड एक्शन बटालियन, दंगा नियंत्रण बल, बॉर्डर गार्ड और भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया।

रिपोर्टों के अनुसार, अदालत के भीतर जाने के लिए कई स्तर की जाँच बनाई गई थी; वकीलों और पत्रकारों को भी पहचान सत्यापन और अनुमति पत्र दिखाने के बाद ही प्रवेश दिया गया। इस माहौल ने यह स्पष्ट कर दिया कि सरकार को निर्णय के बाद संभावित हिंसा की गंभीर आशंका थी।

हसीना पर सिद्ध हुए पाँच आरोप, राज्य शक्ति के बर्बर दुरुपयोग का रिकॉर्ड

अदालत ने अपने फैसले में पूर्व प्रधानमंत्री हसीना पर पाँच अत्यंत गंभीर आरोप दर्ज किए और विस्तृत रिपोर्ट में कहा कि इन घटनाओं को रोकने के बजाय, हसीना सरकार ने इनके संचालन और छिपाव में “सक्रिय प्रशासनिक भूमिका” निभाई।

फैसले में दर्ज अपराधों में शामिल हैं:

  • ⦿ ढाका में प्रदर्शनकारियों की सामूहिक हत्याओं का संचालन और नेतृत्व

⦿ नागरिक भीड़ पर हेलीकॉप्टर और ड्रोन से गोलीबारी का आदेश

⦿ छात्र नेता अबू सैयद की लक्षित हत्या

  • ⦿ सबूत मिटाने के प्रयास में अशुलिया में शवों का दाह-संस्कार

⦿ पुराने शहर चांखारपुर में प्रदर्शनकारियों की योजनाबद्ध हत्या

ट्रिब्यूनल ने इन आरोपों को प्रशासनिक मशीनरी का योजनाबद्ध और क्रूर दुरुपयोग बताया।

पीड़ितों के परिवारों की गवाही और हजारों वीडियो क्लिप बने सबूत

ट्रिब्यूनल के दस्तावेज बताते हैं कि फैसले तक पहुँचने में तीन सौ से अधिक प्रत्यक्षदर्शियों, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों, और डिजिटल फॉरेंसिक विशेषज्ञों की भूमिका रही। अदालत के अनुसार, प्रदर्शनकारियों पर हुई गोलीबारी के 2000 से अधिक वीडियो साक्ष्य अदालत में प्रस्तुत किए गए। कई चश्मदीदों ने यह बयान दिया कि हेलीकॉप्टरों से भीड़ पर गोलियाँ बरसाई गईं, और घायल छात्रों को अस्पताल ले जाने से भी रोका गया।

शेख हसीना का इन सभी आरोपों से इनकार, कहा—यह राजनीतिक साज़िश

निर्वासन में रह रहीं पूर्व प्रधानमंत्री हसीना ने सभी आरोपों को “राजनीतिक प्रतिशोध और षड्यंत्र” बताया है। अगस्त 2024 में सत्ता से हटाए जाने के बाद वे भारत के नई दिल्ली में रह रही हैं। उनकी कानूनी टीम का कहना है कि ट्रिब्यूनल का गठन ही असंवैधानिक था और अंतरिम सरकार हसीना के राजनीतिक प्रभाव को हमेशा के लिए समाप्त करना चाहती है। हसीना के वकीलों का दावा है कि कई वीडियो “एडिटेड” हैं और गवाहों पर दबाव डाला गया। हालाँकि अदालत ने इन दावों को खारिज कर दिया।

फैसले से पहले ही सजीब वाज़ेद की चेतावनी ने माहौल गरमाया

फैसले से कुछ दिन पहले हसीना के पुत्र सजीब वाज़ेद ने कहा था कि यदि उनकी पार्टी Awami League पर लगा प्रतिबंध नहीं हटाया गया, तो पार्टी फरवरी 2025 के राष्ट्रीय चुनाव को रोकेगी। उन्होंने साफ चेतावनी दी कि यह प्रतिबंध हटे बिना चुनाव कराना असंभव होगा और इससे “देश अराजकता में जा सकता है।” उनके इस बयान ने चुनाव आयोग, अंतरिम सरकार और सुरक्षा एजेंसियों में हलचल मचा दी। यह बयान आग में घी डालने जैसा साबित हुआ, क्योंकि इससे समर्थकों में भावनात्मक उबाल और विरोध के नए संकेत दिखे।

ढाका में सुरक्षाबलों की भारी तैनाती, तनाव के बादल और अफवाहों का बाज़ार

फैसले के बाद ढाका शहर में सन्नाटा और खौफ़ दोनों देखने को मिले। बाज़ार जल्दी बंद हो गए, शैक्षणिक संस्थानों को अगले आदेश तक बंद कर दिया गया और कई इलाकों में इंटरनेट गति कम कर दी गई। अंतरिम सरकार को डर था कि फैसले के बाद हसीना समर्थक सड़कों पर उतर आएँगे, इसलिए कई स्थानों पर धारा 144 भी लागू की गई। चश्मदीदों के अनुसार, अदालत के बाहर तैनात सुरक्षाकर्मियों के चेहरों पर भी तनाव साफ दिख रहा था। कई नागरिकों ने कहा कि ऐसा माहौल उन्होंने 2013 के शाहबाग आंदोलन के बाद ही देखा था।

फैसले से पहले और बाद में Awami League ने ढाका में हड़ताल, प्रदर्शन और बंद का आह्वान किया। पार्टी ने यह भी कहा कि अंतरिम सरकार के शासन में “हिंदू समुदाय खतरे में” है। पार्टी ने दावा किया कि युनुस सरकार प्रशासनिक पदों पर “कट्टरपंथी झुकाव वाले लोगों” को बढ़ावा दे रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह बयान पार्टी की रणनीति का हिस्सा है अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समर्थन पाने के लिए धार्मिक अल्पसंख्यकों के खतरे का मुद्दा उठाना।

छात्र आंदोलन 2024 की पृष्ठभूमि जिसने हसीना सरकार को गिराया

2024 का छात्र आंदोलन असल में रोजगार, सैन्य कोटा, और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की माँग से शुरू हुआ था। देखते ही देखते यह आंदोलन देशव्यापी विद्रोह में बदल गया, कई शहरों में लाखों छात्र सड़क पर उतर आए। सरकार ने शुरुआत में इसे “दंगाई समूहों” का काम बताया, लेकिन जैसे-जैसे सुरक्षा बलों के दमन के वीडियो सामने आने लगे, हसीना सरकार आलोचना में घिरती गई। इसी आंदोलन के दौरान दर्जनों छात्रों की मौत हुई, सैकड़ों घायल हुए, और हजारों गिरफ्तार किए गए जिसने जनता और अंतरराष्ट्रीय दबाव को इतना बढ़ा दिया कि हसीना को देश छोड़ना पड़ा।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस फैसले को “दक्षिण एशिया के इतिहास का निर्णायक मोड़” बता रहा है। अंतरिम सरकार चुनाव कराने को तैयार है, लेकिन Awami League का आक्रामक रुख और समर्थकों का उबाल भविष्य के राजनीतिक वातावरण को अनिश्चित बना रहा है।