2024 में होने वाले आम चुनाव से पहले मोदी सरकार का ये आख़िरी बज़ट है|जो कि अंतरिम या फ़िर मिनी बज़ट कहा जा सकता है|लेकिन उससे पहले ये समझना अत्यंत आवश्यक है कि इससे पहले की बज़टों का असर भारत के लोगों पर कैसा रहा है,क्या भारत की जनता पहले की बज़टों का सकारात्मक लाभ ले पा रही है?क्या पहले की बज़टों ने भारत की गरीबी रेखा से नीचे बसर करने वालों की ज़िन्दगी को पटरी पर लाने में सफलता हासिल की है?ऐसे कई सवाल हैं जिनका उत्तर जानना बहुत ज़रूरी है |
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का यह छठा बज़ट है लेकिन सवाल ये है कि वाकई में भारत में 25 करोड़ लोगों को ग़रीबी से बाहर निकला गया है?चौकस भारत न्यूज़ का प्रयास है कि भारत गणराज्य के हर नागरिक को सरकार द्वारा लक्ष्यित प्रत्येक योजनाओं,जनहित कार्यक्रमों की पुख्ता ज़ानकारी हासिल करायी जाय|
भारत में आधिकारिक रूप से यह जानकारी दी गई है कि देश भर में क़रीब 25 करोड़ लोगों को बहुआयामी गरीबी से बाहर निकला गया है, हालांकि,विशेषज्ञों ने इन आंकड़ों पर कई तरह की आपत्ति जताया है| कागज़ पर जश्न मनाने के लिए भारत के पास बहुत सरे तथ्य उपलब्ध हैं| नीति आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले 9 वर्षों में देश में रहने वाले लगभग 24.8 करोड़ लोग बहु आयामी ग़रीबी से बाहर आ गए हैं| रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले 9 वर्षों में बहु आयामी गरीबी में लगभग 18 फ़ीसदी की गिरावट आयी है और इस स्थिति में रहने वालों की संख्या 29 फ़ीसदी से घट कर 11 फ़ीसदी रह गयी है| लेकिन भारत के मशहूर अर्थशास्त्रियों की माने तो इन आंकड़ों की गणना का तरीक़ा यानी कार्यप्रणाली संदिग्ध है|
गरीबी का उचित आकलन
बहुआयामी ग़रीबी,स्वास्थ्य,शिक्षा,और जीवन स्तर पर आधारित है | जिनमे से प्रत्येक को समान महत्त्व दिया जाता है | विशेषज्ञों का कहना है कि इस विधि में वैश्विक स्तर पर गरीबी का आकलन करने की पारंपरिक विधि का पालन नहीं किया गया है,जिसमें उपभोग गरीबी रेखा के नीचे की आबादी की संख्या और हिस्सेदारी महत्वपूर्ण होती है| विशेषज्ञ कहते हैं कि साल 2014 और 2022 के बीच उपभोग व्यय सर्वेक्षण की अनुपस्थिति के बावजूद,भारत में गरीबी संकेतक के रूप में राष्ट्रीय एमपीआई का उपयोग करना,राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है| अर्थ शास्त्री के मुताबिक, “वास्तविक मजदूरी छह साल से स्थिर थी जिसका उपभोग मांगों पर गंभीर प्रभाव पड़ा| जाहिर है,गरीबी के स्तर में जो गिरावट दिखाई जा रही है ये उसके अनुरूप नहीं हो सकती| क्या आकलन की प्रक्रिया और उसके परिणाम बारीकी से जांच करने लायक हैं? क्या एमपीआई गरीबी की पूरी तस्वीर खींचने में सक्षम है?
विश्व बैंक ने अंतरराष्ट्रीय गरीबी रेखा को 2017 की क्रय शक्ति समानता (पीपीपी) के आधार पर परिभाषित किया है| इस आधार पर गरीबी रेखा को 2.15 डॉलर प्रति दिन के रूप में तय किया गया है|पीपीपी विभिन्न देशों में विशिष्ट वस्तुओं की कीमत का एक माप है और इसका उपयोग विभिन्न देशों की मुद्राओं की पूर्ण क्रय शक्ति की तुलना करने के लिए किया जाता है|
पिछले साल अक्तूबर में ग्लोबल हंगर इंडेक्स (जीएचआई) 2023 में भारत कुल 125 देशों में से 111वें स्थान पर था| साल 2015 के बाद से भूख के ख़िलाफ़ इसकी प्रगति लगभग रुकी हुई थी,जो एक वैश्विक प्रवृत्ति को दर्शाता है|
जीएचआई चार घटक संकेतकों पर विभिन्न देशों के प्रदर्शन को मापता है- अल्पपोषण, बच्चों में वेस्टिंग, स्टंटिंग और बाल मृत्यु दर|
हालांकि,सरकार ने त्रुटिपूर्ण कार्यप्रणाली का हवाला देते हुए इस सूचकांक में भारत के प्रदर्शन का विरोध किया था| जारी सूचकांक में भारत का स्कोर 28.7 है, जो भुखमरी के गंभीर स्तर को दर्शाता है|
अब सवाल यह है कि आम चुनाव से पहले मोदी सरकार का यह बज़ट भारत की आम जनता पर कितना सकारात्मक प्रभाव छोड़ने में सक्षम साबित होगा?
