प्रसार भारती के चेयरमैन नवनीत सहगल ने महज 9 महीने पहले मिले पद से अचानक इस्तीफा देकर पूरे प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों को चौंका दिया है। वे मार्च 2024 में तीन साल के कार्यकाल के लिए नियुक्त किए गए थे, लेकिन 2 दिसंबर 2025 को उन्होंने पद छोड़ने का फैसला कर लिया। उनका इस्तीफा तुरंत स्वीकार भी कर लिया गया, जो यह संकेत देता है कि इस निर्णय के पीछे कोई तेज़ और निश्चित कारण रहा है। प्रसार भारती जैसे बड़े संस्थान के शीर्ष पद से अचानक विदाई के कारण उच्च स्तर पर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं कि यह फैसला व्यक्तिगत था, संस्थागत मतभेद से जुड़ा था या किसी आने वाली बड़ी भूमिका की तैयारी है।
चार्टर्ड अकाउंटेंट से IAS बनने की प्रेरक यात्रा
नवनीत सहगल का प्रशासनिक सफर हमेशा से प्रेरक माना जाता रहा है। बेहद कम लोग जानते हैं कि सहगल ने अपनी शुरुआती पढ़ाई कॉमर्स में की और B.Com के बाद वे एक चार्टर्ड अकाउंटेंट बने। लेकिन उनका मन हमेशा पब्लिक लाइफ की ओर खिंचता रहा। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था कि चार्टर्ड अकाउंटेंसी उन्हें आर्थिक स्थिरता दे सकती थी, लेकिन समाज में बदलाव लाने का मौका IAS ही दे सकता था। यही सोच उन्हें सिविल सर्विसेज की ओर लेकर आई। 1988 बैच में चयन के बाद उन्होंने यूपी कैडर चुना और अपना करियर ऐसे दौर में शुरू किया जब राज्य प्रशासन बड़े बदलावों से गुजर रहा था। उनकी ईमानदारी, तेज फैसले और जटिल स्थितियों को संभालने की क्षमता ने उन्हें शुरुआती दिनों में ही अलग पहचान दिला दी।
साल 2007 में जब मायावती यूपी की मुख्यमंत्री बनीं, तो नवनीत सहगल उन अधिकारियों में शामिल थे जिन्हें सरकार ने सबसे ज्यादा जिम्मेदारी सौंपी। उन्हें मुख्यमंत्री सचिवालय में नियुक्त किया गया और एक साथ 12 विभागों की कमान दी गई। यह शायद देश में किसी भी राज्य में किसी भी अधिकारी को एक साथ दी गई सबसे बड़ी जिम्मेदारियों में से एक थी। मायावती सरकार के दौरान उन्हें न सिर्फ प्रशासनिक फैसलों में शामिल किया जाता था, बल्कि कई बड़े प्रोजेक्ट्स और नीतिगत कार्यों में भी उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रहती थी। इस अवधि ने उनकी छवि को एक ऐसे अधिकारी के रूप में स्थापित किया जो दबाव में भी शांत रहते हैं और किसी भी चुनौती को योजनाबद्ध तरीके से संभाल लेते हैं।
अखिलेश यादव के शासन में उतार-चढ़ाव, ‘पनीशमेंट पोस्टिंग’ से लेकर एक्सप्रेसवे तक
2012 में सत्ता परिवर्तन हुआ और समाजवादी पार्टी की सरकार आई। अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री बनने के बाद कई चुनिंदा अफसरों के विभाग बदले गए, जिनमें सहगल भी शामिल थे। उन्हें महत्वपूर्ण विभागों से हटाकर धार्मिक कार्य विभाग में भेजा गया, जिसे उस समय ‘पनीशमेंट पोस्टिंग’ कहा जाता था। लेकिन प्रशासन में उनकी दक्षता और राजनीतिक तटस्थता के चलते उनका करियर फिर से पटरी पर आ गया।
2013 के मुजफ्फरनगर दंगों के बाद सरकार को मीडिया मैनेजमेंट की जरूरत पड़ी और एक बार फिर सहगल को अहम जिम्मेदारी दी गई। बाद में UPEIDA के CEO के रूप में उन्होंने लखनऊ-आगरा एक्सप्रेसवे प्रोजेक्ट को तेजी से पूरा कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह प्रोजेक्ट अखिलेश यादव के ड्रीम प्रोजेक्ट्स में से एक था और इसे समय पर पूरा करने का श्रेय बड़े पैमाने पर सहगल को दिया गया। यह वही समय था जब वे एक बार फिर यूपी के सबसे भरोसेमंद अधिकारियों की श्रेणी में शामिल हो गए।
हाथरस केस और कोविड संकट के दौरान योगी सरकार का भरोसेमंद चेहरा
साल 2020 में हाथरस घटना के बाद यूपी सरकार अभूतपूर्व आलोचना का सामना कर रही थी। जनता, मीडिया और विपक्ष तीनों का दबाव बढ़ गया था। ऐसे समय में योगी सरकार ने एक बार फिर नवनीत सहगल को मीडिया मैनेजमेंट की जिम्मेदारी दी। उन्होंने बेहद संवेदनशील माहौल में सरकार की छवि को संभालने के लिए रणनीति बनाई, सूचना प्रबंधन से लेकर मीडिया संवाद तक सबकुछ पुनर्गठित किया। इसके बाद कोविड-19 की दूसरी लहर के दौरान यूपी पर भारी संकट था। अस्पतालों की स्थिति, ऑक्सीजन की कमी और बढ़ते मामले सरकार को कठघरे में खड़ा कर रहे थे। उस चुनौतीपूर्ण समय में भी सहगल को फ्रंटलाइन पर रखा गया। वे लगातार अपडेट, प्रेस ब्रीफिंग और रणनीतियों का केंद्र बने रहे। कई लोगों ने कहा कि कोविड के दौरान यूपी सरकार की सूचना व्यवस्था सहगल की वजह से ही संभल सकी।
2018 के इन्वेस्टर्स समिट और 2023 के ग्लोबल इन्वेस्टर्स मीट, दोनों ही बड़े आयोजन यूपी की छवि बदलने वाले साबित हुए। इन दोनों आयोजनों की न सिर्फ योजना बल्कि अमल में भी नवनीत सहगल की भूमिका निर्णायक रही। उन्होंने बड़े औद्योगिक घरानों से लगातार बातचीत की, निवेश आकर्षित करने के लिए प्रदेश की रणनीतियां तैयार कीं और समिट की हर गतिविधि की माइक्रो-प्लानिंग की। योगी सरकार की ‘ब्रांड यूपी’ छवि तैयार करने में उनका योगदान इतना अहम था कि कई औद्योगिक संगठनों ने निजी तौर पर उन्हें प्रशंसा-पत्र तक भेजे। यूपी को निवेशकों के लिए आकर्षक गंतव्य बनाने में जो काम पिछले वर्षों में हुआ, उसमें सहगल सबसे केंद्रीय चेहरों में से थे।
प्रसार भारती में डिजिटल बदलाव और ‘WAVES’ OTT का लॉन्च
साल 2024 में जब उन्हें प्रसार भारती का चेयरमैन बनाया गया, उस समय संस्था डिजिटल बदलाव की जरूरत महसूस कर रही थी। सहगल ने आते ही इस दिशा में बड़े कदम उठाए। उन्होंने डीडी फ्री डिश की पहुंच बढ़ाने के साथ प्रसार भारती के कंटेंट को डिजिटल इकोसिस्टम में मजबूत करने पर फोकस किया।
नवंबर 2024 में उन्होंने ‘WAVES’ नाम से प्रसार भारती का पहला OTT प्लेटफॉर्म लॉन्च कराया। इस प्लेटफॉर्म पर दूरदर्शन के पुराने क्लासिक शो, प्रसार भारती के चैनल, डॉक्युमेंट्री और सांस्कृतिक कार्यक्रम मुफ्त में उपलब्ध कराए गए। उन्होंने लॉन्चिंग के समय कहा था कि मीडिया की दुनिया तेजी से बदल रही है और प्रसार भारती को भी दर्शकों तक नए तरीकों से पहुंचने की जरूरत है। ‘WAVES’ को भविष्य की दिशा में एक बड़ा कदम माना गया।
नवनीत सहगल की एक खासियत यह रही कि उन्होंने तीन अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं की सरकारों, बसपा, सपा और भाजपा में समान सम्मान पाया। हाल ही में उनके बेटे शिव सहगल की शादी में योगी आदित्यनाथ, अखिलेश यादव और कई बड़े नेताओं का शामिल होना इस बात का प्रमाण है कि सहगल को सिर्फ अधिकारी नहीं, बल्कि भरोसेमंद और संतुलित व्यक्तित्व के रूप में देखा जाता है। उनकी सामाजिक छवि हमेशा राजनीतिक मतभेदों से ऊपर रही।
उनके इस्तीफे के बाद कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि सहगल किसी नए राष्ट्रीय या केंद्रीय दायित्व के लिए तैयार किए जा रहे हैं। वहीं कुछ विश्लेषक कहते हैं कि उनकी प्रशासनिक पकड़, नेटवर्क और छवि देखते हुए वे राजनीति में भी उतर सकते हैं। यूपी की तीन बड़ी राजनीतिक व्यवस्थाओं में भरोसा हासिल करना किसी भी व्यक्ति के लिए दुर्लभ उपलब्धि होती है और सहगल ने यह उपलब्धि हासिल की है। इसलिए यह भी संभव है कि आने वाले महीनों में वे देश की राजनीति में कोई नई भूमिका निभाते दिखाई दें।
