निक जोनास की गैर-लाभकारी संस्था बियॉन्ड टाइप 1 दुनियाभर में टाइप 1 डायबिटीज़ से जूझ रहे लोगों को जोड़ने, उनका समर्थन करने और उन्हें जरूरी संसाधन देने के लिए काम करती है। प्रियंका चोपड़ा ने हाल ही में अपने इंस्टाग्राम पर घोषणा की कि अब यह वैश्विक मुहिम भारत में भी सक्रिय होगी। प्रियंका ने लिखा कि यह सिर्फ एक अभियान नहीं, बल्कि उन लाखों मरीजों के लिए एक आवाज़ है जिन्हें समाज में अक्सर समझा नहीं जाता और जिन्हें बीमारी के कारण अलग-थलग महसूस किया जाता है। उनके शब्दों में साफ झलकता है कि यह पहल लोगों में जागरूकता फैलाने, शिक्षा देने और मानसिक समर्थन देने के साथ-साथ डायबिटीज़ के कलंक को मिटाने के लिए बनाई गई है।
प्रियंका ने आगे लिखा कि उनकी समझ टाइप 1 डायबिटीज़ के बारे में पति निक जोनास के अनुभव से शुरू हुई। निक ने अपनी बीमारी के बावजूद सफलता और प्रेरणा के कई उदाहरण पेश किए हैं। प्रियंका ने कहा कि निक हर दिन यह दिखाते हैं कि बीमारी इंसान की पहचान नहीं बल्कि सिर्फ जीवन का एक हिस्सा है।
निक जोनास की जर्नी: अकेलेपन से प्रेरणा तक का सफर
निक जोनास को 13 साल की उम्र में टाइप 1 डायबिटीज़ का पता चला था। उस समय उनकी दुनिया उलट-पुलट हो गई थी और उन्हें डर था कि क्या वह सामान्य जीवन जी पाएंगे। शुरुआती दौर में उन्हें अकेलापन और मानसिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उन्होंने महसूस किया कि इस बीमारी से जूझते हुए बहुत से लोग भी उसी तरह असहाय महसूस करते हैं जैसे वह खुद महसूस कर रहे थे। यही अनुभव उन्हें बियॉन्ड टाइप 1 की स्थापना के लिए प्रेरित किया। निक ने यह सुनिश्चित किया कि यह मंच मरीजों को जरूरी ज्ञान, सहायता, सामुदायिक समर्थन और उनके आत्म-सम्मान के लिए संसाधन मुहैया कराए।
निक का मानना है कि टाइप 1 डायबिटीज़ केवल शारीरिक चुनौती नहीं बल्कि मानसिक और सामाजिक चुनौती भी है। उनके अनुसार, जब मरीज और परिवार खुले मन से अपनी जर्नी साझा करते हैं, तब उन्हें अपनी बीमारी के साथ बेहतर तरीके से जीने की ताकत मिलती है। इस पहल का मकसद यही है कि मरीज और उनके परिवार खुद को अकेला महसूस न करें और उनके लिए जागरूकता फैलाकर समाज का नजरिया बदला जाए।
भारत में डायबिटीज़ की स्थिति और जागरूकता की आवश्यकता
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भारत में 18 वर्ष से अधिक उम्र के करीब 7.7 करोड़ लोग डायबिटीज़ से पीड़ित हैं। दुनिया में सबसे अधिक डायबिटीज़ मरीजों वाले देशों में भारत दूसरे स्थान पर है। खासकर टाइप 1 डायबिटीज़ के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं और युवा मरीजों को समय पर सही जानकारी और इलाज नहीं मिल पाता। इस बीमारी के प्रति समाज में गलत धारणाएं और कलंक भी देखने को मिलते हैं, जिससे मरीज मानसिक रूप से कमजोर होते हैं। प्रियंका चोपड़ा ने लिखा कि बहुत से युवा अकेलेपन, डर और सामाजिक कलंक का सामना कर रहे हैं। ऐसे में बियॉन्ड टाइप 1 का भारत में आगमन युवाओं और उनके परिवारों के लिए आशा और मार्गदर्शन का काम करेगा। अभियान का उद्देश्य न केवल बीमारी के बारे में जागरूकता फैलाना है, बल्कि टाइप 1 डायबिटीज़ से जूझ रहे लोगों की कहानियों को साझा कर उन्हें सम्मान और प्रेरणा देना भी है।
अभियान में शामिल प्रेरक चेहरे और उनकी कहानी
भारत में अभियान के तहत कई ऐसे प्रेरक व्यक्तित्वों की कहानियां सामने आएंगी जिन्होंने डायबिटीज़ को अपनी सफलता की राह में बाधा बनने से रोक दिया। इसमें शामिल हैं लेफ्टिनेंट कर्नल कुमार गौरव, मेहरिन राणा, निशांत अमीन, श्रेया जैन, इंदु थंपी और हरिचंद्रन पोनुसामी। इन सभी ने व्यक्तिगत संघर्ष और चिकित्सा चुनौतियों के बावजूद अपनी ज़िंदगी में सफल कदम उठाए हैं। उनकी कहानियां न केवल प्रेरणा देंगी बल्कि डायबिटीज़ के प्रति समाज की गलत धारणाओं और कलंक को भी तोड़ेंगी। प्रियंका ने कहा कि यह अभियान उन लोगों के जीवन को सामने लाएगा जिन्होंने बीमारी के बावजूद अपने सपनों को पूरा किया और समाज में सकारात्मक बदलाव लाए। यह पहल न सिर्फ जागरूकता फैलाएगी बल्कि डायबिटीज़ के मरीजों में आत्मविश्वास और अपनी बीमारी को स्वीकार करने की क्षमता भी बढ़ाएगी।
निक जोनास और प्रियंका चोपड़ा का यह अभियान केवल स्वास्थ्य जागरूकता तक सीमित नहीं है। इसका उद्देश्य लोगों को यह समझाना भी है कि डायबिटीज़ से जूझना अकेला काम नहीं है और सही जानकारी, समर्थन और संसाधनों के जरिए मरीज अपनी जिंदगी पूरी क्षमता के साथ जी सकते हैं। प्रियंका ने इस पहल को एक सामाजिक जिम्मेदारी बताया और कहा कि यह अभियान भारतीय समाज में टाइप 1 डायबिटीज़ के प्रति समझ और सहानुभूति पैदा करेगा।
विशेषज्ञ भी मानते हैं कि जागरूकता और कलंक हटाने वाले अभियान युवाओं और उनके परिवारों के मानसिक स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं। इस पहल के चलते मरीज न केवल अपनी बीमारी को समझेंगे बल्कि समाज में अपनी पहचान को सुरक्षित और सम्मानजनक महसूस करेंगे।
