गिलर्मो डेल टोरो का मानवीय राक्षस और राक्षसी मानव के बीच का दिल दहला देने वाला संवाद
जब सृजन खुद अपने निर्माता से प्रश्न पूछे
गिलर्मो डेल टोरो का Frankenstein (2025) केवल एक क्लासिक कहानी का पुनर्निर्माण नहीं, बल्कि एक आत्मा की पुकार है—एक ऐसा दार्शनिक विलाप जो पूछता है:
“क्या सृजन करने का अर्थ भगवान बनना है, या खुद को नष्ट करना?” डेल टोरो ने इस फ़िल्म को भय की नहीं, भावना की भूमि पर गढ़ा है। हर दृश्य मोमबत्ती की रौशनी में धड़कते दिल जैसा एक कविता जो अस्तित्व की पीड़ा से लिपटी है। ऑस्कर आइज़ैक का विक्टर फ्रेंकेंस्टाइन एक ऐसा व्यक्ति है जो अपने ही दर्द से भागते हुए, उसे पुनः जन्म देता है—मांस और हड्डियों के रूप में। वह वैज्ञानिक नहीं, एक टूटा हुआ पुत्र है। उसके भीतर पिता के अत्याचार की प्रतिध्वनि है जो उसे अपने ही “सृजन” को त्यागने पर मजबूर करती है।
डेल टोरो इस चरित्र को सिर्फ पागलपन का प्रतीक नहीं, बल्कि “पीढ़ीगत आघात” (Generational Trauma) का जीवंत चित्र बनाते हैं।
विक्टर और उसकी रचना के बीच का रिश्ता—पिता और पुत्र, ईश्वर और मनुष्य, रचयिता और रचना—सब एक दर्दनाक दर्पण में विलीन हो जाते हैं।
जैकब एलॉर्डी का ‘प्राणी’: राक्षस नहीं, दर्पण में झांकती आत्मा
जैकब एलॉर्डी का अभिनय फ़िल्म का सबसे चमकदार और भयावह तत्व है क्योंकि वह डराता नहीं, महसूस कराता है। उसकी आँखों में वही सवाल तैरता है जो हम सबके भीतर गूंजता है “क्या मैं सिर्फ किसी और की गलती का परिणाम हूँ?” डेल टोरो उसे “राक्षस” नहीं, बल्कि एक “जन्म लेते हुए एहसास ” की तरह दिखाते हैं। वह क्रूरता से नहीं, करुणा से जन्म लेता है , उसकी साँसों में पीड़ा है, न कि पाप।
मिया गोथ का एलीज़ाबेथ: प्रेम की वह रोशनी जो अंधेरे से लड़ती है
मिया गोथ का अभिनय फ़िल्म की आत्मा है—मौन में बोलती संवेदना। वह केवल प्रेमिका नहीं, बल्कि मानवता का अंतिम अवशेष है। उसकी उपस्थिति हर दृश्य को नरम बनाती है, जैसे तूफ़ान में कोई मोमबत्ती स्थिर खड़ी हो। सिनेमैटोग्राफर डैन लॉस्टसन और डेल टोरो मिलकर एक ऐसी दृश्य भाषा रचते हैं जो “दर्द की बनावट” को आकार देती है। हर फ्रेम किसी पेंटिंग की तरह मिट्टी, धुंध, मोमबत्ती और आँसुओं से बना हुआ। रंगों का प्रयोग प्रतीकात्मक है , संवाद कम हैं, मौन ही कथा बन जाता है। डेल टोरो का कैमरा चीखता नहीं, सुनता है।फ़िल्म का केंद्र यही है “क्या हम अपने सृजन के प्रति ज़िम्मेदार हैं?”
यह प्रश्न केवल विक्टर का नहीं, हर रचयिता का हैचाहे वह ईश्वर हो, कलाकार हो, या पिता। डेल टोरो इस सवाल को प्रेम, अपराधबोध और क्षमा के बीच झूलने देते हैं। अंत में, वह हमें डराकर नहीं, मुक्त करके छोड़ते हैं क्योंकि सच्चा भय यह नहीं कि हम मरते हैं बल्कि यह कि हम अपने भीतर की मानवता को खो देते हैं।
एक जीवित कविता, जो मृत्यु के पार जाती है
Frankenstein (2025) सिर्फ एक फ़िल्म नहीं, एक भावनात्मक प्रयोगशाला है जहाँ विज्ञान और आत्मा का संगम होता है। गिलर्मो डेल टोरो ने इसे हॉरर नहीं, एक प्रार्थना की तरह गढ़ा है, उनके लिए जो प्रेम करना जानते हैं, लेकिन उसे संभाल नहीं पाते। “यह राक्षसों की नहीं, मनुष्यों की कहानी है और मनुष्य कभी-कभी सबसे भयानक प्राणी होता है।”यह एक काव्यात्मक त्रासदी जो दिल को चीरती भी है, और भरती भी।
रेटिंग: 4.5 / 5
