समग्र संस्कृत विकास समिति (Samagra Sanskrit Vikas Samiti) के तत्वावधान में सिन्हा लाइब्रेरी रोड स्थित बी. आई. ए. सभागार में महान नीतिज्ञ “चाणक्य के विचारों का दार्शनिक अध्ययन’ विषय पर सेमिनार का आयोजन गुरुगोविंद सिंह महाविद्यालय के पूर्व संस्कृत विभागाध्यक्ष कॉलेज में हुआ। डॉ० मिथिलेश कुमार तिवारी के नेतृत्व में सम्पन्न हुए इस कार्यक्रम में समिति की ओर से दार्शनिक अध्ययन पालि, अर्थशास्त्र, संस्कृत साहित्य के क्षेत्र में समर्पित विद्वानों, सांस्कृतानुरागियों को अंगवस्त्रम् एवं स्मृति चिन्ह भेंटकर 80 विद्वानों को सम्मानित भी किया गया।

इस कार्यक्रम का प्रारंभ पटना विमेन्स कॉलेज की संस्कृत प्रतिष्ठा की छात्रा मोनिका झा ने मंगालाचरण गा के किया। अतिथियों का स्वागत करते हुए कार्यक्रम के संचालक डॉ० मिथिलेश तिवारी ने मीडिया संबोधन में कहा कि “सभी भारतीयों को संस्कृत में अपने विचारों को व्यक्त करने की आवश्यकता है। चाणक्य के जीवन से हमें प्रेरणा लेनी चाहिए। विषय प्रवर्तन करते हुए आधुनिको भव संस्कृतं वद अभियान के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं बिहार संस्कृत संजीवन समाज के महासचिव डॉ० मुकेश कुमार ओझा ने कहा कि भारतीय संस्कृति संस्कृत में बसती है। संस्कृत की रक्षा भारत की आत्मा की रक्षा करने जैसा है।”

संस्था के सह सचिव डॉ० सुबोध कुमार सिंह ने कहा कि “संस्कृत केवल एक मात्र भाषा नहीं है अपितु संस्कृत एक संस्कार है।” वहीं, उदघाटनकर्ता विनोदबिहारी महतो कोलांचल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो0 सुखदेव भोई ने कहा कि “आज के संदर्भ में चाणक्य की महत्वपूर्ण भूमिका समझने की आवश्यकता है। चाणक्य को समझे बिना भारत की अर्थव्यवस्था ठीक नहीं हो सकती।”

मुख्य अतिथि के रूप में पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो० आर० के० सिंह ने कहा कि “भारतीय नेताओं को चाणक्य का अर्थशास्त्र पढ़ना चाहिए। चाणक्य का अर्थशास्त्र व्यवहार पर बल देता है।” पद्मश्री विमल कुमार जैन मुग्ण वक्ता के रूप में विचारों को व्यक्त करते हुए कहा कि “चाणक्य की नीति विश्वव्यापी महत्व है।” विधान पार्षद डॉ० नवल किशोर यादव ने विशिष्ट अतिथि के रूप में कहा कि “बिहार की जहाँ संस्कृत और संस्कृति समृद्ध है, वहाँ के संस्कार मलिन होते जाए तो यह चिंता का विषय है। इस तरह के सेमिनार का आयोजन हमेशा होना चाहिए।”

भारत तिब्बत सहयोग मंच के राष्ट्रीय सचिव श्री शिवाकांत तिवारी ने कहा कि “संस्कृत को केवल भाषा नहीं समझें / संस्कृत का विकास होगा तो बच्चों में संस्कार विकासित होगा। संस्था को संस्कृत बोलने के लिए संस्कृत “संभाषण ” शिविर का आयोजन करना चाहिए।” समाजसेवी ललन सिंह ने कहा कि “बिहार संस्कार संस्कृति और संस्कृत के लिए विश्व में प्रसिद्ध रहा है। सबको समान भाव से देखने वाले को चाणकय ने पंडित की संज्ञा दी है। ऐसा पंडित बनना भारत के लिए गर्व की बात है। अपने अध्यक्षीय भाषण में दर्शन के ज्ञाता प्रो० रमेश चन्द्र सिन्हा ने कहा कि “चाणक्य शांति के पुजारी थे। चाणक्य के दर्शन में सभ्यता और राष्ट्रीय अस्मिता की रक्षा के लिए संघर्ष का मार्गदर्शन है। सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा ही राष्ट्रीय प्रगति का आधार होगा। बिहार का दर्शन और साहित्य आज भी नग्र संस्कृत विकास समिति, बिहार, पटना समाज का पथ प्रदर्शक है, जिसमें “वसुधैव कुटुम्बकम्” का भाव निहित है।

इस अवसर पर प्रो० कनक भूषण मिश्र, आर० एन० सिंह, डॉ० हृदय नारायण यादव, डॉ० सुबोध कुमार सिंह, डॉ० रागिनी वर्मा, जीतेन्द्र गौतम, डॉ० ज्योति शंकर सिंह, शैलेन्द्र त्रिपाठी, डॉ० सुरेश द्विवेदी, डॉ० संजय कुमार सिंह, डॉ० पल्ल्वी ने भी अपने विचार में चाणक्य की प्रासंगिकता रेखांकित की। वहीं, सेमिनार के पश्चात गायिका नीतू कुमारी नूतन एवं डॉ० संजय कुमार सिंह ने संस्कृत हिन्दी गीतों की प्रस्तृति से संस्कृत प्रेमियों का दिल जीता। कार्यक्रम का संस्कृत भाषा में संचालन डॉ० मुकेश कुमार ओझा ने किया,धन्यवाद ज्ञापन प्रो० जयेति शंकर सिंह ने किया।

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