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महाराजगंज में बंगरा नाम से एक गांव ऐसा है जहां एक साथ 27 स्वतंत्रता सेनानी हुआ करते थे। इस गांव के स्वतंत्रता सेनानियों ने देश की आजादी के लिए अपनी जान न्यौछावर कर दी। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में बंगरा गांव का नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा हुआ है। इसी में उन 27 सैनानियों का नेतृत्व उमाशंकर बाबू ने किया था। जो बाकि के कुछ गुमनाम महान पुरुषो में से ही एक है। तो आज की कहानी उमाशंकर प्रसाद के नाम।

~ उमाशंकर प्रसाद – “दांडी मार्च, सत्याग्रह आंदोलन”

सीवान जिले के महाराजगंज में जब अंग्रेजी हुकूमत का विरोध शुरू हुआ तो नौजवानों की टोली का नेतृत्व उमाशंकर प्रसाद ने ही किया था। उमाशंकर बाबू ने जब देश गुलाम था उस वक्त महाराजगंज में शिक्षा की अलख जगाने के लिए अपने निजी भूमि पर निजी कोष से उमाशंकर प्रसाद हाई स्कूल की स्थापना कर शिक्षा का दीप प्रज्वलित किया। उस स्कूल में उमाशंकर बाबू बच्चो को स्वतंत्रता आंदोलन के लिए तैयार करते थे। जिसके बाद से सभी छात्र अग्रणी भूमिका निभाते हुए इस लड़ाई में शामिल होते थे।

नमक बनाओ आंदोलन, सत्याग्रह और अपने स्कूल में छात्रों को अंग्रेजों से लड़ने की शिक्षा देने के कारण अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें 1942 में देखते ही गोली मार देने का आदेश जारी किया था। इस आदेश के बाद उमाशंकर बाबू भूमिगत हो गए। भूमिगत होने के बाद उमाशंकर बाबू ने आंदोलन में लगे लोगों को आर्थिक सहायता देनी शुरू कर दी। 1928 में महाराजगंज पहुंचे महात्मा गांधी को उमाशंकर प्रसाद 1001 रूपए की थैली दी ताकि देश को आजाद कराने में धन की कमी न हो। इस राष्ट्र प्रेम को देखकर अंग्रेज सैनिकों ने उमाशंकर प्रसाद हाई स्कूल में आग लगा दी और उनकी दुकान लूट ली। आजादी के बाद उन्होंने देशहित में मुआवजा लेने से इंकार कर दिया।

देश की आज़ादी में उनका बड़ा मेहनत था, भले खुले तौर पर ना सही मगर भूमिगत होकर उनका योगदान प्रशंसा करने योग था। देश आज़ाद होने के बाद सं 1962 और 1967 में उमाशंकर बाबू महराजगंज विधानसभा के विधायक रहे। वहीं करीबन 40 वर्षो तक अपने क्षेत्र महराजगंज यूनियन बोर्ड के चेयरमैन के दर्ज़े पर भी रहे थे। अपने कर्तव्य का पालन करते हुए उमाशंकर प्रसाद 15 अगस्त के ही दिन सं 1985 को चल बेस। उनके शुरू कि गई हाई स्कूल में आज भी पढाई होती है और हर साल 15 अगस्त के दिन उनके मूर्ति पर श्रद्धांजलि देते हुए मालार्पित कर कार्यक्रम किया जाता है।

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