1999 के कारगिल युद्ध में शहीद हुए सैनिको के याद में आज के दिन को कारगिल दिवस के नाम से मनाया जाता है। आज का दिन देशभक्तो के लिए काफ़ी महत्त्वपूर्ण हुआ करता है। हर साल आज के दिन प्रधानमंत्री दिल्ली के इंडिया गेट स्थित अनन्त लौ (eternal flame) और अमर जवान ज्योति पर देश के लिए शहीद हुए 527 भारतीय सैनिको को श्रद्धांजलि अर्पित करते है। हालांकि इस साल कोरोना की वज़ह से कारगिल दिवस को धूम धाम से नहीं मनाया जायेगा। लेकिन फिर भी उन शहीद वीरो को श्रद्धांजलि अर्पित ज़रूर की जाएगी।
बात करें 1999 में युद्ध की तो पाकिस्तान के सैनिको और आतंवादियों ने सबसे पहले भारत में घुसपैठ कर जम्मू-कश्मीर के उधमपुर के पहाड़ो पर बसेरा डाल दिया था। जिसके फलस्वरूप उन घुसबैठो ने ऊँचे पहाड़ो से निचले स्थर पर बसे भारतीय सेना पर आकस्मित आक्रमण कर अचानक युद्ध शुरू कर दिया था। उनके इस युद्ध का एकमात्र कारण कारगिल पर फ़ते हासिल करना था। लेकिन भारतीय सेना ने भी बखूबी हमले का मुँहतोड़ जवाब देकर उन्हें अंततः मार गिराया था। 3 मई को शुरू हुई और करीबन ढाई महीने लम्बी चली इस युद्ध को आख़िरकार आज के दिन यानी 26 जुलाई को भारतीय सेना ने जीत कारगिल पर दुबारा तिरंगा लहराया था।
लड़ाई में भारत ने जीत तो हासिल कर ली थी मगर इस युद्ध के दौरान कई जवान शहीद भी हुए थे। मई 1999 में बिहार रेजिमेंट्स की पहली बटैलियन अपने ड्यूटी पर तैनात थी जब पाकिस्तान ने घुसपैठ कर कारगिल पर अपना झंडा फहराना चाहा। पाकिस्तानी सैनिको के हमले के ज़वाब में सबसे पहले बिहार रेजिमेंट के जांबाज़ मेजर एम. सर्वानन ने राकेट लांचर से दिया था और कुछ इसी प्रकार भारतीय सेना की और से भी लड़ाई की शुरुवात हुई थी। दुश्मनो से लड़ने में सबसे पहला बलिदान भी बिहार के योद्धा एम. सर्वानन ने ही दिया था। मातृभूमि की सेवा करते हुए कर्तव्य की पंक्ति में उन् 527शहीद जवानो में बिहार के 18 वीर भी शामिल थे और फिर उन बिहार के रेजिमेंट के सम्मान में पटना के गाँधी मैदान स्थित कारगिल चौक बनाया गया था। यहाँ भी हर साल 26 जुलाई को बिहार के मुख्यमंत्री श्रद्धांजलि अर्पित करते है।

