सोन नदी के बालू को पीला सोना भी कहते हैं। बालू की अच्छी क्वालिटी की वजह से इसकी मांग बिहार से बाहर उत्तर प्रदेश तक होती है। आम दिनों में भी सोन के बालू की कीमत अन्य नदियों से निकलनेवाले बालू से ज्यादा होती है। जब-जब बालू का संकट उत्पन्न होता है इसका भाव आसमान छूने लगता है। अब इसी बालू पर नक्सलियों की नजर पड़ गई है।
हतास, भोजपुर, औरंगाबाद, अरवल और पटना जिले से गुजरनेवाली सोन नदी का अधिकांश इलाका नक्सल प्रभावित रहा है। पैठ वाले इलाकों की भौगोलिक स्थिति की वजह से नक्सली अफीम की खेती को बढ़ावा देते रहे हैं। उनकी कमाई का दूसरा स्रोत निर्माण एजेंसियों से लेवी वसूलना है। इन दो जरिए के अलावा अब नक्सलियों ने बालू के धंधे में पैर जमाना शुरू कर दिया है। खासकर सोन नदी के बालू पर उनकी नजर है।
खुफिया एजेंसियों को इसका शक पहले था, पर अब यह यकीन में बदल चुका है। जून में औरंगाबाद के रफीगंज इलाके में अवैध बालू लदा एक ट्रैक्टर पुलिस ने जब्त किया था। छानबीन के दौरान पता चला कि वह ट्रैक्टर संजीत कुमार मिश्रा के नाम से पंजीकृत है। संजीत मिश्रा कोई और नहीं बल्कि प्रतिबंधित भाकपा (माओवादी) के केन्द्रीय कमेटी का सदस्य रहे प्रमोद मिश्रा का बेटा है। प्रमोद मिश्रा लम्बे समय तक जेल में रहने के बाद रिहा हुआ था। रिहाई के बाद कुछ महीनों तक औरंगाबाद स्थित अपने गांव पर रहा फिर अचानक गायब हो गया। बताया जाता है कि प्रमोद मिश्रा दोबारा से माओवादियों के साथ होकर संगठन की मजबूती के लिए काम कर रहा है।
सोन नदी का बालू का बहुत ज़ायदा इस्तेमाल पुरे बिहार में होने वाले निर्माण कार्य में होता है ,चाहे वो सरकारी हो या गैरसरकारी हो। पिछले बहुत दिनों से नक्सलियों का संगठन कमज़ोर हुआ है। पीला सोना से आने वाला पैसा से वो अपने संगठन को मजबूत करने की कोशिश में हैं।
