पटना के गांधी मैदान ने शुक्रवार की शाम इतिहास को नए रंगों में जीते हुए देखा। जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दीप प्रज्वलित कर 41वें पटना पुस्तक मेले का उद्घाटन किया, तो पूरा मैदान एक उत्सव-स्थल में बदल गया जहाँ हर दिशा से तालियों की गड़गड़ाहट और उत्साह की आवाजें उठ रही थीं। वर्षों की सांस्कृतिक परंपरा को आगे बढ़ाता यह मेला केवल किताबों की प्रदर्शनी नहीं, बल्कि बिहार की बौद्धिक विरासत का प्रतीक है, जो हर उम्र के पाठकों को जोड़ते हुए उनके भीतर के जिज्ञासा-बीज को पोषित करने का काम करता है। जिस तरह से लोग दूर-दूर से आते दिखाई दिए, उससे साफ था कि यह आयोजन केवल साहित्य का नहीं, बल्कि संवेदनाओं, विचारों और ज्ञान की रोशनी का उत्सव बन चुका है।

मुख्यमंत्री का विस्तृत भ्रमण, प्रकाशकों से संवाद और विभागीय स्टालों की सराहना

उद्घाटन के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने स्टॉलों का बहुत ही गहन और सूक्ष्म अवलोकन किया। उन्होंने प्रकाशकों से बातचीत करते हुए न केवल उनकी चुनौतियाँ सुनीं, बल्कि पाठकों की पसंद और बदलते साहित्यिक रुझानों पर भी चर्चा की। इस दौरान जल संसाधन मंत्री विजय कुमार चौधरी, प्रमंडलीय आयुक्त, आईजी, जिलाधिकारी और कई वरिष्ठ अधिकारी उनके साथ रहे। सबसे खास बात रही बिहार राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के नए स्टॉल का लोकार्पण, जहाँ मुख्यमंत्री ने आम जनता को जागरूक करने की इस पहल की सराहना की। उनका यह पूरा भ्रमण यह बताता है कि सरकार इस मेले को सिर्फ एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक विकास के केंद्र के रूप में देखती है।

कई स्टॉल अधूरे, पर पाठकों के जोश के आगे रही सारी कमियाँ नगण्य

हालांकि 200 से अधिक स्टॉलों में से कई पहले दिन पूरी तरह तैयार नहीं थे, कहीं किताबें अभी सज रही थीं, कहीं बैनर लगाए जा रहे थे लेकिन पाठकों के उत्साह ने हर कमी को ढँक दिया। हजारों की संख्या में आए लोग अपनी मनपसंद पुस्तकों की सूचियाँ लिए स्टॉलों के बीच ऐसे घूम रहे थे मानो किसी ज्ञान-नगर के मार्गों पर चल रहे हों। बच्चों के हाथों में कॉमिक्स की लिस्ट थी, युवाओं में सेल्फ-हेल्प, दर्शन और साहित्य की किताबों को लेकर खास रुचि दिखी, जबकि बुजुर्ग अपने पुराने प्रिय लेखकों की खोज में किताबों के ढेर खंगालते दिखाई दिए। बदलते समय और डिजिटल युग की लहरों के बावजूद लोगों का यह जुनून साबित करता है कि किताबें आज भी दिलों को जोड़ने की सबसे मजबूत कड़ी हैं।

कवि सम्मेलन ने साहित्यिक आनंद की पहली शाम को बनाया अविस्मरणीय

उद्घाटन के कुछ ही देर बाद शुरू हुए कवि सम्मेलन ने मेले की पहली शाम को एक अनोखे साहित्यिक अनुभव में बदल दिया। शायर शहंशाह आलम की नज्मों की नर्मी, नताशा की कविता की संवेगशीलता, चंद्रबिंद और अरविंद पासवान की गहरी अभिव्यक्तियाँ तथा राजेश कमल के प्रभावशाली शब्द—इन सबने मिलकर मेले को एक अलग ऊँचाई दी। मंच संचालन कर रहे उत्कर्ष ने पूरे कार्यक्रम को एक ऐसी लय दी कि श्रोताओं की तालियाँ थमने का नाम नहीं ले रहीं थीं। कविता और शायरी की यह शाम यह बताने के लिए काफी थी कि पुस्तक मेला केवल पढ़ने का नहीं, बल्कि सुनने, महसूस करने और अपनी आत्मा को शब्दों की ऊर्जा से भरने का स्थान भी है।

ओशो, जेपी और कालजयी उपन्यासों की मांग ने स्टॉलों पर बढ़ाई रौनक

इस वर्ष की सबसे बड़ी खासियत रही युवाओं द्वारा दर्शन और जीवन-शैली पर आधारित पुस्तकों में बढ़ती रुचि। ओशो की ध्यान प्रक्रियाओं वाली किताबें पहले ही दिन सबसे ज्यादा बिकने वालों में रहीं। वाणी प्रकाशन के स्टॉल पर ‘कैकेयी के राम’ की चर्चा लगातार होती रही, जबकि राजकमल प्रकाशन पर लोकनायक जयप्रकाश नारायण के जीवन और राजनीतिक आंदोलन पर आधारित पुस्तकों की जबरदस्त मांग ने प्रकाशकों को व्यस्त कर दिया। धर्मवीर भारती की ‘गुनाहों का देवता’ जैसे क्लासिक उपन्यास हमेशा की तरह युवाओं की पहली पसंद साबित हुए। प्रकाशकों की ओर से दी जा रही 20% तक की छूट ने भी खरीदारी को नई गति दी, जिससे कई स्टॉलों पर लोगों की लंबी कतारें बन गईं।

सरकारी विभागों के नवाचार प्रधान स्टॉलों ने आकर्षित की बड़ी भीड़

विज्ञान एवं तकनीकी शिक्षा विभाग के 3D और वर्चुअल रियलिटी शो ने मेले का माहौल और भी रोमांचक बना दिया। बच्चे और युवा मंगल ग्रह पर वर्चुअल यात्रा कर रहे थे, अंतरिक्ष विज्ञान के नए आयामों को समझ रहे थे और वैज्ञानिक संभावनाओं की दुनिया से रूबरू हो रहे थे। महिला एवं बाल विकास निगम, श्रम संसाधन विभाग, जन संपर्क विभाग और आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के स्टॉल भी बेहद जानकारीपूर्ण और आकर्षक रहे। लोग योजनाओं, नए कार्यक्रमों और नवाचारों के बारे में जानकारी लेते हुए लंबी देर तक रुके रहे, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि मेला केवल साहित्य नहीं, शासन और जन-जागरूकता का भी प्रभावी मंच बन चुका है।

धार्मिक साहित्य, सेल्फी ज़ोन और मुफ्त वितरण ने मेले में बढ़ाई रंगत

इस वर्ष धार्मिक पुस्तकों का मुफ्त वितरण भी पाठकों के बीच बेहद लोकप्रिय रहा। कई लोग आध्यात्मिक पुस्तकों के लिए लाइनों में खड़े दिखाई दिए। वहीं युवाओं के बीच मेले का सेल्फी ज़ोन सबसे अधिक आकर्षण का केंद्र रहा, जहाँ किताबों पर आधारित बैकग्राउंड, लेखक-थीम वाली वॉल और पढ़ने को प्रोत्साहित करने वाले स्लोगन लिखी दीवारें तस्वीरों का हिस्सा बनती रहीं। इस तरह के आयोजन यह बताते हैं कि किताबें केवल ज्ञान ही नहीं, बल्कि एक अनुभव भी हैं जिसे लोग यादों में कैद करना चाहते हैं।

प्रवेश व्यवस्था सुचारू, विद्यार्थियों के लिए खास रियायतें

गांधी मैदान के तीन मुख्य द्वार, अगस्त्य मुनि द्वार, विश्वामित्र द्वार और चरक द्वार, इस बार मेले की भव्यता का हिस्सा बने हैं। स्कूल यूनिफॉर्म में आने वाले बच्चों को मुफ्त प्रवेश दिया जा रहा है और सोमवार से शुक्रवार तक कॉलेज छात्रों को भी टिकट नहीं खरीदना होगा। यह पहल युवाओं को पढ़ने की ओर प्रोत्साहित करने की दिशा में एक बड़ा कदम है, और पहले ही दिन इसकी सफलता भी दिखी जब हज़ारों छात्र बिना किसी व्यवधान के मेले में प्रवेश करते दिखाई दिए।

कला, सिनेमा और साहित्य का अनोखा संगम बनेगा आने वाले दिनों का आकर्षण

इस बार मेला केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं है। पंकज त्रिपाठी अभिनीत “लाली” और अखिलेंद्र मिश्र की “बारात” जैसी चर्चित फिल्मों के विशेष प्रदर्शन की तैयारी ने फिल्म प्रेमियों में पहले से ही उत्साह भर दिया है। रंगकर्मी प्रेमलता मिश्रा, अभिनेता कुणाल सिंह और जयमंगल देव जैसे कलाकारों को सम्मानित किया जाएगा, जिससे यह आयोजन कला की विभिन्न विधाओं का संगम बन जाएगा। यह व्यापकता इस मेले को केवल पुस्तक-प्रदर्शनी नहीं, बल्कि पूर्ण सांस्कृतिक उत्सव बना देती है।

मेले में मुख्यमंत्री द्वारा लेखक मुरली मनोहर श्रीवास्तव की पुस्तक ‘विकास पुरुष’ का विमोचन भी चर्चा का बड़ा विषय रहा। यह केवल एक औपचारिक विमोचन नहीं था, बल्कि साहित्यिक समाज को प्रोत्साहित करने और लेखकों के प्रयासों को मान्यता देने का कदम था। इससे मेले का महत्व और भी बढ़ गया और साहित्य जगत में नई ऊर्जा महसूस की गई।