बेलडांगा की गलियों में शनिवार की सुबह एक असामान्य ऊर्जा थी। हवा में अजीब सी हलचल थी, जैसे कोई बड़ा मोड़ आने वाला हो। हुमायूं कबीर के समर्थक सिर पर ईंटें रखे एक-एक करके निकलते दिखाई दिए। किसी के चेहरे पर उत्साह, किसी पर गर्व, और कुछ के चेहरे पर ऐसी दृढ़ता, जैसे वे किसी ऐतिहासिक मोड़ का हिस्सा बनने जा रहे हों। समर्थकों ने कहा कि यह सिर्फ ईंट नहीं, बल्कि बाबरी मस्जिद की पुनर्स्थापना में उनकी पहचान का प्रतीक है। इस दृश्य में एक ओर धार्मिक भावनाओं का उभार था, दूसरी ओर राजनीतिक संदेश। कैमरों की भीड़, स्थानीय लोगों का घरों की छतों से झांकना और सुरक्षा बलों की बढ़ती गतिविधि इस बात की गवाही दे रही थी कि बेलडांगा आज केवल एक कस्बा नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक संघर्ष का केंद्र बन चुका है।
हाईकोर्ट का फैसला और राज्य सरकार पर बढ़ी जिम्मेदारी
कोलकाता हाईकोर्ट का आदेश इस पूरे वातावरण को अचानक नई दिशा दे गया। मस्जिद निर्माण पर रोक लगाने की मांग को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि शांति बनाए रखना पूरी तरह राज्य सरकार की जिम्मेदारी होगी। यह बयान सिर्फ कानूनी टिप्पणी नहीं था, बल्कि एक चेतावनी भी थी, जिसमें संकेत था कि यदि हिंसा या अव्यवस्था हुई तो राज्य को जवाब देना होगा। इस आदेश के बाद प्रशासन तेजी से हरकत में आया। देर रात तक डीएम और एसपी स्तर की बैठकों का दौर चला। इलाकों की संवेदनशीलता को देखते हुए बेलडांगा और रानीनगर को न सिर्फ हाई अलर्ट बल्कि ‘सुपर विजिलेंस ज़ोन’ घोषित किया गया। कोर्ट के निर्णय ने कबीर के समर्थकों में उत्साह पैदा किया, वहीं सुरक्षा एजेंसियों में चिंता भी बढ़ा दी।
अभूतपूर्व सुरक्षा घेरा, बंगाल में शायद ही कभी देखा गया हो
सुरक्षा बलों की इतनी भारी तैनाती सामान्य राजनीतिक सभाओं में नहीं देखी जाती। लेकिन बेलडांगा की स्थिति किसी सामान्य आयोजन की तरह नहीं थी। सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्स की 19 टुकड़ियाँ, RAF की विशेष इकाइयाँ, BSF के तैयार दस्ते और स्थानीय पुलिस की सैकड़ों गाड़ियाँ इलाके में दौड़ती नजर आईं। तीन हजार से अधिक जवानों को तीन स्तरों की सुरक्षा में बांटा गया। पहले घेरों में भीड़ नियंत्रण, दूसरे घेरों में संवेदनशील बिंदुओं की निगरानी और तीसरे घेरों में इंटेलिजेंस टीमें तैनात की गईं। सिविल ड्रेस में भी पुलिसकर्मियों को भीड़ के भीतर भेजा गया। मेटल डिटेक्टर्स, ड्रोन कैमरे और मोबाइल नेटवर्क पर नजर रखने वाली विशेष साइबर टीम भी सक्रिय हो चुकी है। अधिकारियों के अनुसार, इतनी भारी सुरक्षा व्यवस्था बंगाल में केवल चुनावों या अंतरराष्ट्रीय शख्सियतों की यात्रा के समय लगती है। इस तरह की तैनाती इस आयोजन के जोखिम और राजनीतिक संवेदनशीलता की गंभीरता को दर्शाती है।
शिलान्यास कार्यक्रम विशाल जनसभा में बदलता हुआ
कबीर ने प्रशासन को बताया कि कार्यक्रम में तीन लाख से ज्यादा लोग पहुंचेंगे, और उनकी टीम की तैयारियाँ उसी स्तर की हैं। कार्यक्रम का स्थल किसी धार्मिक भूमि की तरह नहीं बल्कि किसी बड़े राजनीतिक उत्सव जैसा सजाया गया है। 25 बीघे के विस्तृत मैदान में बना 150 फीट लंबा और 80 फीट चौड़ा मंच दूर से ही नजर आता है। इसे बारिश और तेज हवा के खिलाफ मजबूत किया गया है ताकि भीड़ बढ़ने पर कोई दुर्घटना न हो। मंच के भीतर धार्मिक नेताओं, दानदाताओं, देश और विदेश से आने वाले मेहमानों के लिए अलग सेक्टर बनाए गए हैं। ट्रैफिक को संभालने के लिए NH-12 पर 70 ट्रैफिक पुलिसकर्मी लगाए गए हैं। 60 हजार बिरयानी पैकेट तैयार करवाए गए हैं, जिनकी महक आस-पड़ोस के इलाकों में फैल चुकी है। कार्यक्रम में 3 हजार वॉलंटियर सुरक्षा बलों के साथ समन्वय कर रहे हैं। यह पूरा वातावरण राजनीतिक और धार्मिक शक्ति प्रदर्शन जैसा दिख रहा है।
बीजेपी और TMC के आरोप-प्रत्यारोप से तेज हुआ विवाद
बीजेपी नेता दिलीप घोष ने जिस तीखे स्वर में प्रतिक्रिया दी, उसने राजनीतिक तापमान को और तेज कर दिया। उनका कहना था कि यह पूरा आयोजन मुस्लिम वोट बैंक को साधने की रणनीति है और 6 दिसंबर के दिन को जानबूझकर चुना गया है ताकि राजनीतिक फायदा उठाया जा सके। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि TMC और हुमायूं कबीर के बीच आंतरिक तालमेल है, भले ही TMC ने उन्हें निलंबित कर दिया हो। घोष ने 1992 के अयोध्या आंदोलन का जिक्र करते हुए कहा कि यह तारीख सिर्फ एक समुदाय के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश की संवेदनशीलता से जुड़ी है। दूसरी ओर TMC ने आधिकारिक बयान देकर खुद को इस आयोजन से अलग बताया। पर बंगाल की राजनीति में यह सवाल बड़े पैमाने पर उठ रहा है कि हुमायूं कबीर अकेले इतनी बड़ी व्यवस्था कैसे कर पा रहे हैं।
पोस्टरों से शुरू हुआ विवाद जो राजनीतिक विस्फोट में बदला
28 नवंबर को जब बेलडांगा में बाबरी मस्जिद शिलान्यास के पोस्टर लगे, तब यह केवल स्थानीय चर्चा का विषय था, लेकिन दो दिनों में यह राष्ट्रीय खबर बन गया। पोस्टरों में 6 दिसंबर का दिन अंकित था, और आयोजक के रूप में हुमायूं कबीर का नाम लिखा था। बीजेपी ने तुरंत विरोध किया और कहा कि यह चुनावी ध्रुवीकरण की कोशिश है। कांग्रेस के कुछ नेताओं ने इसे मुस्लिम भावनाओं का सम्मान बताया। इसी बीच 3 दिसंबर को TMC ने साफ कहा कि कबीर की घोषणा से पार्टी का कोई संबंध नहीं है। और 4 दिसंबर को हुमायूं कबीर को पार्टी से सस्पेंड कर दिया गया। इसके बाद कबीर का एक और बड़ा बयान सामने आया कि वे 22 दिसंबर को अपनी नई पार्टी बनाएँगे और 135 सीटों पर उम्मीदवार खड़े करेंगे। इस घोषणा ने विवाद को राजनीतिक विस्फोट में बदल दिया।
कबीर की जिद, राजनीतिक महत्वाकांक्षा और नया समीकरण
हुमायूं कबीर का दावा कि बाबरी की नींव रखना उनका व्यक्तिगत और धार्मिक फैसला है, राजनीतिक स्तर पर कई संकेत देता है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि वे किसी भी राजनीतिक दबाव के सामने नहीं झुकेंगे। TMC द्वारा निलंबित किए जाने के बाद उन्होंने कहा कि उन्हें पहले भी 2015 में छह साल के लिए निलंबित किया गया था और फिर भी वे अपनी बात से पीछे नहीं हटे। उनका यह बयान कि तीन साल में मस्जिद बनकर तैयार हो जाएगी, उनके समर्थकों में उत्साह और विपक्ष में चिंता पैदा कर रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कबीर इस मुद्दे के माध्यम से मुस्लिम मतदाताओं में अपनी नई पकड़ बनाना चाहते हैं और यह बंगाल के चुनावी समीकरण को नया मोड़ दे सकता है।
धन्नीपुर मस्जिद का निर्माण ठप, समुदाय में बढ़ती निराशा
अयोध्या के धन्नीपुर गांव में 2019 के सुप्रीम कोर्ट आदेश के बाद जो पांच एकड़ जमीन मुस्लिम पक्ष को दी गई थी, वहां अब तक मस्जिद निर्माण शुरू नहीं हो सका है। इंडो-इस्लामिक कल्चरल फाउंडेशन की ओर से मस्जिद और अस्पताल सहित सामुदायिक भवनों का डिजाइन तैयार किया गया था, लेकिन अयोध्या विकास प्राधिकरण की मंजूरी न मिलने के कारण निर्माण अटक गया। छह वर्षों से इंतजार करते मुस्लिम समुदाय के लोगों में बड़ी निराशा है। यह खालीपन ऐसी जमीन तैयार करता है जिस पर हुमायूं कबीर जैसे नेता ‘कहीं तो नींव रखनी ही होगी’ जैसे भावनात्मक संदेश के सहारे अपनी राजनीति खड़ी करने की कोशिश कर रहे हैं।
