कभी भारतीय टेस्ट टीम की घर में अजेयता दुनिया भर में मिसाल हुआ करती थी। 2012 से शुरू हुआ यह दबदबा हर गुजरते साल के साथ और मजबूत होता गया। विदेशी बल्लेबाज भारतीय पिच पर घूमती गेंद के सामने टिक ही नहीं पाते थे और भारतीय बल्लेबाज घरेलू परिस्थितियों का फायदा उठाकर टीम को लगातार जीत दिलाते थे। रवि शास्त्री इस सुनहरे दौर का एक महत्वपूर्ण स्तंभ रहे। लेकिन हाल के समय में यह पूरा ढांचा हिल गया है। पिछले एक साल में दो बार भारतीय टीम को घरेलू टेस्ट सीरीज में हार का सामना करना पड़ा और इस बार दक्षिण अफ्रीका ने भारत को 0–2 से मात देकर यह साबित कर दिया कि भारतीय टीम अब वैसी ताकत नहीं दिखा पा रही। इसी टूटते दबदबे ने गंभीर पर सवाल खड़े कर दिए हैं और टीम का आत्मविश्वास भी दरकता दिखाई दे रहा है।
रवि शास्त्री की दो टूक राय और गंभीर को दी गई सख्त सलाह
रवि शास्त्री ने कभी टीम के साथियों को डांटने में हिचक नहीं दिखाई और अब भी उनकी बातों में वही वन-ऑन-वन कड़क अंदाज़ साफ दिखता है। उन्होंने भारतीय टेस्ट टीम की गिरती हालत को लेकर गौतम गंभीर को बहुत सीधा संदेश दिया। शास्त्री ने कहा कि भारतीय क्रिकेट में कोचिंग पद एक प्रतिष्ठित जिम्मेदारी है और अगर कोच टीम को जीत की राह पर वापस नहीं ला पाता तो उसकी भूमिका हमेशा सवालों के घेरे में रहती है। उनकी नजर में गंभीर के सामने सबसे बड़ी चुनौती खिलाड़ियों के साथ खुलकर संवाद कायम करना है। शास्त्री का मानना है कि टीम को प्रेरित करने के लिए कोच को पहले धैर्य बनाए रखना चाहिए और बदलते माहौल में खुद को भी लगातार सीखते रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह खेल दबाव का नहीं बल्कि संतुलन और शांति का खेल है और इसी मानसिकता के साथ गंभीर को आगे बढ़ना होगा।
भारतीय टीम की दोहरी हार और साझा जिम्मेदारी की सच्चाई
शास्त्री ने पूरी स्पष्टता के साथ कहा कि केवल कोच नहीं बल्कि टीम प्रबंधन से लेकर हर खिलाड़ी इस नतीजे के लिए बराबर का जिम्मेदार है। भारत की हार किसी एक खराब पारी या एक गलत फैसले का नतीजा नहीं बल्कि रणनीति, चयन और मानसिक तैयारी में फैली कमजोरी का परिणाम है। दक्षिण अफ्रीका ने दोनों मैचों में बेहतर बल्लेबाजी, अनुशासित गेंदबाजी और मजबूत कैचिंग दिखाकर भारत को दबाव में रखा। इसके उलट भारत टीम के भीतर समन्वय की कमी साफ दिखी। बल्लेबाजी क्रम में बदलाव लगातार सवाल खड़ा करता रहा और गेंदबाजी में विकेट निकालने की क्षमता उसी धार से नहीं दिखी जैसी वर्षों तक भारतीय टीम की पहचान रही। शास्त्री के अनुसार जब टीम इस स्तर पर हारती है तो हर सदस्य को यह सोचना पड़ता है कि वह टीम के भीतर किस तरह योगदान दे रहा है और कहां कमी छोड़ रहा है।
गंभीर पर मंडराते खतरे और मीडिया में बढ़ती अटकलें
लगातार मिल रही हारों के बाद यह स्वाभाविक था कि मीडिया गंभीर के भविष्य पर सवाल उठाए। कई रिपोर्टों में यह दावा किया गया कि बोर्ड गंभीर के कामकाज की गहन समीक्षा कर सकता है और अगर आने वाले टूर्नामेंट में टीम का प्रदर्शन न सुधरा तो उनकी नौकरी पर भी खतरा मंडरा सकता है। हालांकि यह भी बात सामने आई कि फिलहाल गंभीर को इसलिए बनाए रखा गया है क्योंकि भारतीय बोर्ड के पास तत्काल कोई मजबूत वैकल्पिक कोच उपलब्ध नहीं है। फिर भी इस चर्चा ने गंभीर पर मानसिक दबाव जरूर बढ़ा दिया है और हर मैच अब उनके लिए एक परीक्षा की तरह बन गया है जहां गलतियों की गुंजाइश को और कम माना जा रहा है।
बीसीसीआई की आधिकारिक प्रतिक्रिया और गंभीर के लिए राहत की सांस
इन्हीं सवालों के बीच बीसीसीआई सचिव देवजीत सैकिया का बयान आया जिसने माहौल थोड़ा शांत किया। उन्होंने कहा कि बोर्ड किसी भी तरह के भावनात्मक या जल्दबाजी वाले फैसले नहीं लेता और भारतीय क्रिकेट की दिशा लंबे समय की सोच पर आधारित होती है। उनके अनुसार हार और जीत हर टीम का हिस्सा है और एक खराब दौर किसी खिलाड़ी या कोच की क्षमता को तय नहीं करता। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस समय किसी बदलाव की योजना नहीं है और किसी परिणाम पर पहुंचने से पहले पूरे सत्र की समीक्षा की जाएगी। इस बयान ने गंभीर को कुछ राहत तो दी है, लेकिन यह राहत अस्थायी है क्योंकि आगे आने वाले बड़े टूर्नामेंट ही उनके भविष्य की असली दिशा तय करेंगे।
गंभीर के कार्यकाल का मिला-जुला प्रदर्शन और सामने खड़ी चुनौती
गौतम गंभीर के कोच बनने के बाद भारतीय टेस्ट टीम ने उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं किया है। नौ में से पांच घरेलू टेस्ट गंवाना किसी भी भारतीय कोच के लिए असामान्य और चिंताजनक है। बॉर्डर गावस्कर ट्रॉफी लगभग एक दशक बाद हाथ से निकल गई और इंग्लैंड के खिलाफ टीम केवल ड्रॉ बचा पाई। इन नतीजों ने यह संकेत दिया कि टीम संक्रमण के दौर से गुजर रही है और गंभीर अभी तक वह लय नहीं बना पाए हैं जिसकी उनसे उम्मीद थी। हालांकि सफेद गेंद क्रिकेट में उनके नेतृत्व में टीम ने एशिया कप और चैंपियंस ट्रॉफी जीतकर अपनी ताकत दिखाई है। लेकिन भारतीय क्रिकेट में असली कसौटी हमेशा से टेस्ट क्रिकेट ही रहा है और अब गंभीर को उसी कसौटी पर खरा उतरने की चुनौती का सामना है। उन्हें टीम को न सिर्फ रणनीतिक रूप से मजबूत करना होगा बल्कि खिलाड़ियों में खोया आत्मविश्वास भी लौटाना होगा।

