भारतीय मूल के प्रसिद्ध इतिहासकार प्रोफेसर सुनील अमृत ने एक बार फिर भारतीय प्रतिभा की चमक से विश्व को रोशन किया है। उनकी पुस्तक “The Burning Earth: An Environmental History of the Last 500 Years” को प्रतिष्ठित “British Academy Book Prize 2025” से सम्मानित किया गया है। यह पुरस्कार, जिसकी राशि £25,000 (करीब ₹26 लाख) है, उन गैर-काल्पनिक पुस्तकों को दिया जाता है जो मानव समाज और विश्व की गहराई से पड़ताल करती हैं।

दर्शाया धरती और मानव के 500 वर्षों का संघर्ष

सुनील अमृत की यह पुस्तक बीते पाँच शताब्दियों में मानव सभ्यता और पर्यावरण के जटिल रिश्तों की कहानी कहती है। उन्होंने बताया है कि कैसे उपनिवेशवाद, औद्योगिकीकरण और बदलती मानव बस्तियों ने न केवल आधुनिक समाज का रूप गढ़ा, बल्कि हमारे पर्यावरण को भी गहराई से प्रभावित किया।
ब्रिटिश एकेडमी में बुधवार शाम आयोजित समारोह में निर्णायक मंडल ने इस पुस्तक को आज के जलवायु संकट को समझने के लिए आवश्यक और चेतावनी भरी कृति बताया है। अमृत का यह कार्य हमें याद दिलाता है कि इतिहास केवल अतीत का लेखा-जोखा नहीं, बल्कि भविष्य को दिशा दिखाने वाला दर्पण भी है।

सुनील अमृत के प्रेरक विचार: अंधेरे में भी रोशनी की है तलाश

पुरस्कार ग्रहण करते हुए प्रोफेसर अमृत ने अमेरिका से लाइव वीडियो संदेश में कहा कि “मुझसे अक्सर पूछा जाता है कि क्या The Burning Earth एक उदास पुस्तक है? हाँ, इसमें दुख और विनाश के कई चित्र हैं, लेकिन मैं चाहता हूँ कि पाठक इसमें आशा के बीज भी देखें , वे रास्ते जो हमने कभी नहीं चुने, वे विचार जो भुला दिए गए हैं , वे आंदोलन जो असफल भले हुए पर एक अमर विरासत छोड़ गए हैं उन्हें मानवता द्वारा याद रखी जाए।”

उन्होंने आगे कहा कि शायद उन्हीं भूले-बिसरे रास्तों में हमें फिर से एक आशावान, शांतिपूर्ण और संतुलित जीवन का सूत्र मिल सकता है। उनकी आवाज़ में वह संवेदनशीलता थी जो बताती है कि पर्यावरण की रक्षा केवल एक वैज्ञानिक विषय नहीं, बल्कि मानवीय जिम्मेदारी भी है।

जजों ने The Burning Earth को बताया महान और मन को छू लेने वाला ग्रंथ

ब्रिटिश इतिहासकार और निर्णायक मंडल की अध्यक्ष प्रोफेसर रेबेका अर्ल ने The Burning Earth को मानव इतिहास और पर्यावरणीय परिवर्तन के बीच संबंधों की एक भव्य व्याख्या बताया। उन्होंने कहा कि , “यह पुस्तक न केवल सुंदर भाषा में लिखी गई है, बल्कि यह हर उस व्यक्ति के लिए अनिवार्य पठन है जो जलवायु संकट की जड़ों को समझना चाहता है।”

ब्रिटिश एकेडमी की अध्यक्ष प्रोफेसर सुसान जे. स्मिथ ने भी अमृत के कार्य को “वैज्ञानिक साक्ष्यों और मानवीय करुणा का दुर्लभ संगम” कहा। उनके अनुसार, यह पुस्तक हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि इतिहास केवल तिथियों और युद्धों का नहीं, बल्कि धरती के साथ हमारे रिश्तों का भी दस्तावेज़ है।

एक भारतीय मूल का वैश्विक इतिहासकार

46 वर्षीय सुनील अमृत वर्तमान में अमेरिका की येल यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफेसर हैं। उनका जन्म केन्या में हुआ, उनका पालन-पोषण सिंगापुर में हुआ और उन्होंने कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी, इंग्लैंड से स्नातक किया।


उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि ज्ञान और संस्कृति की कोई सीमाएँ नहीं होतीं। एक भारतीय मूल के व्यक्ति ने आज वैश्विक स्तर पर यह सिद्ध कर दिया कि भारतीय सोच और दृष्टिकोण दुनिया को नई दिशा दे सकता है।