बिहार की राजनीति में चुनावी मौसम आते ही एक पुराना नज़ारा फिर से लौट आया है | विधानसभा चुनावों की उम्मीदवार सूची किसी राजनीतिक दस्तावेज़ से ज़्यादा अब पारिवारिक मिलन समारोह जैसी दिखती है जहां बेटे, बेटियां, बहुएं, दामाद, भतीजे, भांजे सभी सम्मिलित हैं | सवाल यह नहीं है कि कौन कौन सी पार्टी इस दौड़ में शामिल है, बल्कि मुख्य सवाल यह है कि कौन इस वंशतंत्र के बैलेट में शामिल नहीं हैl
जनता दल (यू), राष्ट्रीय जनता दल (राजद), लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास), हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा, विकासशील इंसान पार्टी, और यहां तक कि हाल ही में बनी जन सुराज पार्टी , सबों को एक समान धागा जोड़ती है “नाम ही पहचान, रिश्ता ही टिकट|”
राजद, जिसे लंबे समय से वंशवादी राजनीति का प्रतीक माना गया है , इस बार भी परिवार की छाया से बाहर नहीं निकल पाया | तेजस्वी यादव तो पार्टी का चेहरा बने ही हैं, लेकिन महुआ से तेज प्रताप यादव का अलग मैदान में उतरना परिवारिक खींचतान को भी उजागर कर रहा है| उधर, स्वर्गीय मोहम्मद शाहाबुद्दीन के बेटे ओसामा शाहाब और माफिया-राजनीतिज्ञ मुन्ना शुक्ला की बेटी शिवानी शुक्ला को टिकट देकर राजद ने एक बार फिर यह संदेश दिया है कि “नाम” ही सबसे बड़ा टिकट का संसाधन है|
दूसरी ओर एनडीए की तस्वीर भी कुछ अलग नहीं| जीतन राम मांझी ने अपने परिवार के तीन सदस्यों को मैदान में उतारा है — बहू, सास और दामाद| नीतीश कुमार की पार्टी ने भी लोक जनशक्ति की विरासत से आने वाली कोमल सिंह को टिकट दिया है| चिराग पासवान ने भतीजे और साले को सियासी सफर का हिस्सा बनाया है | उपेंद्र कुशवाहा ने पत्नी को उम्मीदवार बनाया , वहीं विकासशील इंसान पार्टी के मुखिया मुकेश सहनी ने भाई को सियासी मैदान में
उतारा | कभी भ्रष्टाचार और परिवारवाद के खिलाफ उठने वाला जेपी आंदोलन अब उन्हीं परिवारों की जड़ें सींचता दिख रहा है|
चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने हाल ही में कहा था, “बिहार की राजनीति आज भी करीब 1,200-1,300 परिवारों के कब्जे में है, जबकि राज्य में 3 करोड़ से ज़्यादा परिवार हैं|”
यह सिर्फ आंकड़ा नहीं, एक चुभता हुआ आईना है — सत्ता का केंद्रीकरण अब लोकतंत्र की आत्मा को खोखला कर रहा है|
लेकिन सवाल यह भी है कि पार्टियां आखिर इन रिश्तेदारों पर इतनी निर्भर क्यों हैं? जवाब सीधा है — ‘पारिवारिक पूंजी’ आज भी यह सबसे भरोसेमंद चुनावी पूंजी है। एक जाना-पहचाना नाम, स्थानीय नेटवर्क, पुराने वोट बैंक और जातिगत समीकरणों की समझ — यह सब किसी नए उम्मीदवार के पास नहीं होती | परिवार नाम की यह “तुरंत मशीनरी” वही काम करती है, जिसके लिए किसी और को सालों की मेहनत करनी पड़ती है|
मगर यह शॉर्टकट लोकतंत्र की जड़ों में दीमक भी बन रहा है | राजनीति अब अवसर नहीं, उत्तराधिकार बनती जा रही है| जहां टिकट रिश्तों में बांटे जाते हैं, वहां मेरिट और क्षमता पिछली सीट पर बैठाई जाती है।
आगे के दिनों में देखने को मिलेगा कि क्या बिहार की जनता अब भी उसी नीति भरोसा करेगी जिनपे दशकों से करती आई है —“परिवार से ही विकास”? या अब वक्त आ गया है यह जानने का कि क्या राजनीति वाकई जनता की है, या कुछ परिवारों की निजी जागीर बनकर रह है |
