SH-Bihari

एक शायर, अदब की दुनिया में किसी भी पहचान के मोहताज नहीं होते हैं। वो तो बस अपने कलम से काम करने में मशगूल रहते हैं। जिस दौर में कैफ़ी आज़मी, साहिर लुधियानवी जैसे मशहूर शायरों का दबदबा था उस दौर में बिहार का एक लड़का बॉलीवुड में अपने लफ़्ज़ों के जादू से धाक जमा रहा था। आज़ादी के दौर में जहाँ बिहार के राजेंद्र प्रसाद अपनी योग्यता से देश चलाने में अपना योगदान दे रहें थें वहीं, एक और बिहारी ने बॉम्बे जाकर अपनी एक ऐसी पहचान बनाई जिनके गाने आज भी लोगों के जुबान पर बैठे हुए हैं। आईये बात करते हैं बहुत ही मशहूर गीतकार की, जिनके गीते तो हर किसी के जुबान पर है लेकिन जिनका नाम हर किसी के दिमाग से उतर चूका है। ये गीतकार तो अपने नाम में ही बिहारी टाइटल लगाते थें और वो थें S. H. Bihari यानी की शम्शुल हुदा बिहारी।

आपने “कजरा मोहब्बत वाला” गाना तो सुना ही होगा। वही गाना जो आजकल इंस्टाग्राम रील पर ट्रेंड पर बना हुआ है। ये गाना अपने वक़्त का एक सदाबहार गाना था, ऐसा मैं नहीं कह सकती क्योंकि ये आज भी उतना ही सदाबहार है जितना लोग इसे उस वक़्त में पसंद किया करते थें। लेकिन क्या आपको पता है की ये गाना जिसमें महबूबा की इतनी तारीफ हो रही है, वो लिखने वाले कोई शायर नहीं बल्कि एक फुटबॉल प्लेयर थें। और वो भी कहाँ के, बिहार के। बिहार के आरा ज़िले में जन्में S. H. Bihari ने एक से बढ़कर एक गाने लिखें हैं। उन्होंने अपनी काबिलियत से बॉलीवुड में अपने नाम का डंका बजवाया है।

हालाँकि S. H. Bihari का जन्म बिहार में हुआ लेकिन उनकी शिक्षा कोलकाता में हुई, जहां उन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज से बीए की डिग्री हासिल की। कॉलेज के दिनों से ही वो प्रेम कवितायेँ और गीत लिखा करते थें। लेकिन कहीं न कहीं फुटबॉल का प्रेम उन्हें अपनी ओर खींच ही लेता था। उनका कहना था की उनके हाथ और पैर दोनों चलते हैं। हाथ इसलिए चलते हैं की वो बहुत अच्छे राइटर हैं और पैर इसलिए चलते हैं की वो फुटबॉल बहुत अच्छा खेलते हैं। उस दौर में S. H. Bihari, फ़ुटबॉल इतना अच्छा खेलते थें की उन्हें कोलकाता के मशहूर टीम मोहन बगान से खेलने का मौका मिला। लेकिन किसे पता था की फुटबॉल का ये खिलाड़ी आगे जाकर लफ़्ज़ों का ऐसा खिलाड़ी बनेगा, जो एक से बढ़कर एक गाने लिखेगा।

फुटबॉल में उनकी ज़बरदस्त पकड़ थी लेकिन उनके दिमाग में कुछ ऐसा चल रहा था की देश आज़ाद होते ही उन्होंने 1947 में बॉम्बे का रुख किया। बॉम्बे पहुंचते ही काफ़ी मशक्कत करने के बाद उन्हें वहाँ काम मिला। ऐसा माना जाता है की उन्हें पहला ब्रेक महान संगीतकार अनिल विश्वास ने दिया। अनिल विश्वास ने S. H. Bihari की एक ग़ज़ल सुनी और उनसे फिल्म लाडली में दो गाने लिखवाएं।

1950 में एक फ़िल्म आयी थी “दिलरूबा।” इसका एक गीत था “हटो-हटो जी आते हैं हम।” बस यहीं से बिहारी साहब के फ़िल्मी कॅरियर की शुरुआत मानी जाती है लेकिन अफ़सोस की बात ये है की न ही ये गीत लोगों की जुबान पर चढ़ सका और न ही किसी की नजर में। फिर इसी साल आई फ़िल्म निर्दोष और इसके बाद बेदर्दी, खूबसूरत, निशान डंका और 1953 में रंगीला में भी उन्होंने इक्का-दुक्का गीत लिखें जो लोगों की जुबां पर छाने में नाकाम रहे। 1954 में एक फिल्म आयी थी शर्त, जिसमें एस.एच. बिहारी ने राजेंद्र कृष्ण के साथ मिलकर एक गीत लिखा था, ‘न ये चांद होगा, न तारे रहेंगे/मगर हम हमेशा तुम्हारे रहेंगे’, देखते ही देखते ये गाना जबर्दस्त हिट साबित हुआ।

ये किस्सा भी गौर करने लायक है की जब S. H. Bihari खासा संघर्ष कर रहें थें तब उस ज़माने के बहुत बड़े फिल्म स्टूडियो फिल्मिस्तान के चक्कर काटा करते थें। उम्मीद ये रहती थी की किसी तरह शशिधर मुखर्जी से उनकी मुलाकात हो जाये, लेकिन ऐसा हो न सका। लेकिन एक दिन अचानक इत्तेफाक से इनकी मुलाकात मुखर्जी साहब से हो गयी। S. H. Bihari ने जब मुखर्जी साहब को सलाम किया तब उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया, शायद ये भी मुखर्जी साहब की कोई अदा होगी। खैर, मुखर्जी साहब ने जब बिहारी जी से पूछा की क्या बेचते हो तब उन्होंने कहा, “दिल के टुकड़े”, मगर वो नहीं जिनकी तारीफ फ़िल्मी गीतों में इस तरह से की जाती है की “एक दिल के टुकड़े हज़ार हुए, कोई यहाँ गिरा कोई वहां गिरा।” मुखर्जी साहब उनके इस अंदाज़ से बहुत खुश हुए और फिर उसके बाद उन्हें काम भी मिला।

उन्हें महान संगीतकार ओ.पी. नैयर के साथ काम करने का भी मौका मिला। उन्होंने नैयर साहब के साथ ऐसा बेजोड़ काम किया की उनके संगीत करियर की गाड़ी बुलेट ट्रेन से भी तेज़ दौड़ने लगी। नैयर साहब के साथ जुड़कर इन्होंने एक से एक बेहतरीन गीत लिखे। नैयर साहब इन्हें “शायर-ए-आजम” कहा करते थे। वे कहते थें की S. H. Bihari से बड़ा शायर और कोई नहीं। इतना ही नहीं बिहारी साहब के गीतों को आशा भोंसले और मोहम्मद रफ़ी ने अपनी कशिश भरी आवाज से अमर बनाने का काम भी किया। उनके गाने तारीफ़ करूं क्या उसकी जिसने तुम्हें बनाया, कजरा मोहब्बत वाला, है दुनिया उसी की ज़माना उसी का, इशारों इशारों में दिल लेने वाले, आज भी गुनगुनाए और सुने जाते हैं।

बिहारी साहब के गाने तो बहुत हिट हुआ करते थें लेकिन न जाने कुछ ऐसा था की इनका नाम होता तो था लेकिन फिर धुंधला भी पड़ जाता था। वो ज़्यादातर रोमांटिक गीत लिखा करते थें, लेकिन 70 के दशक में गीत और संगीत दोनों का रूप और रंग बदल गया। और इसकी वजह ये थी की रोमांटिक हीरो की जगह एंग्री हीरो आ गए। इसलिए बिहारी साहब को काम मिलना कम हो गया।

बिहारी साहब गाने बहुत अच्छा लिखा करते थें लेकिन उन्हें उसका सही दाम नहीं मिल पता था। और यही वजह थी की वो अपने परिवार के लिए रोज़ी-रोटी का इंतेज़ाम सही तरीके से नहीं कर पाएं। बिहारी साहब कहानी, डायलाग और गीत सभी लिख लिया करते थें। 80 के दशक में उन्होंने लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के साथ काम किया, फिल्म “प्यार झुकता नहीं” के लिए। इसकी कहानी, डायलाग और गीत सभी S. H. Bihari ने लिखे थें। ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सुपर डुपर हिट साबित हुई।

इस फिल्म के हिट होने के साथ S. H. Bihari फिर से चमक ही रहें थे की उन्हें मौत ने गले लगा लिया। 1987 में दिल का दौरा पड़ने से वो ये दुनिया छोड़ चल बसे। बिहारी साहब ख्वाबों और ख्यालों से दूर जीवन के सच को बयां करने वाले गीत लिखने के लिए फेमस थे। भारतीय सिनेमा के इतिहास में जब भी महानतम गीतकारों का नाम लिया जायेगा तो पहली फ़ेहरिस्त में बिहार के इस लाल S. H. Bihari का नाम शामिल ज़रूर रहेगा।

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